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रविवार, 22 जनवरी 2017

हवा का सुरसुरापन

               स्टेडियम के सिमेंटेड पट्टी पर तेज कदमों से चलते हुए ग्रुपबाजों (पहले की #दिनचर्या में ग्रुपबाजों का परिचय दिया हुआ है) के बीच के आपसी वार्तालाप को सुनते हुए आगे निकल गया था...उनकी बात कोई खास तो नहीं थी लेकिन मेरा ध्यान उनकी बातों पर अवश्य चला गया... "घर में जब दो साथी लड़ने लगते हैं तो गुस्से मे सामानों को नुकसान पहुंचाने लगते हैं" यहाँ "साथी" का मतलब मैं नहीं समझ पाया था...लेकिन कुछ कामनसेंस लगा कर पति-पत्नी के बीच के विवाद को लगाया.... फिर उनकी बात सुनी "लेकिन सामानों को नुकसान पहुँचाना ठीक नहीं... आदमी कैसे-कैसे करके सामान बनाता है.." 
         इसी कड़ी में इनकी बात चल रही थी..."किस तरह हम दूर स्कूल कभी पैदल कभी साइकिल से जाकर पढ़े तब यहाँ पहुँचे हैं...तब बिजली भी नहीं होती थी...ढिबरी की रोशनी में पढ़े हैं...यहाँ तक कि लालटेन होना भी बड़ी बात होती थी...किसी-किसी घर अगर लालटेन होती भी थी तो एकाध ही...टार्च होना भी बड़ी बात होती...अब टार्च की जरूरत ही नहीं रह गई है...बच्चे कहते हैं टार्च की क्या जरूरत...."
             हाँ, आज बहुत दिनों बाद मैं साढ़े पांच बजे मैं स्टेडियम में टहलने पहुँचा था.. स्टेडियम में अँधेरा था...इधर महोबा में एक-दो दिन से ठंडी थोड़ी कम हुई है तभी स्टेडियम की ओर टहलने का मन किया था... वैसे भी महोबा में कुल मिलाकर छह-सात दिन ही तगड़ी ठंडी पड़ती है..अन्यथा जाड़े की धूप भी यहाँ कड़ी ही लगती है..स्टेडियम में टहलते हुए आज सुरसुरी हवा बह रही थी...यह हमारे पूर्वांचल जौनपुर या कहें लखनऊ की हिमालयी हवा जैसी हांड कंपाने वाली हवा नहीं होती ...कुल मिलाकर टहलते हुए यह हवा सुखद एहसास भर रही थी...स्टेडियम की उस सिमेंटेड पट्टी पर एक बेहद छोटा पिल्ला सिकुड़ा-सिकुड़ा सा कूँ-कूँ करता हुआ भागा जा रहा था...शायद उस पिल्ले को ठंड लग रही थी... उसकी माँ यानी कुतिया उससे काफी पीछे रह गई थी...मैंने झुककर उस पिल्ले को सहलाया और आगे बढ़ गया...कुछ दूर आगे जाने पर पीछे मुड़कर मैंने देखा तो वह पिल्ला जैसे मेरा पीछा करते हुए मेरे पीछे-पीछे चला आ रहा है...हलाँकि मेरी चाल तेज थी फिर वह मेरा पीछा नहीं कर पाया था...
           इधर ग्रुपबाजों की बातें सुनते हुए मैं उनसे आगे निकल आया था...उनकी बातें सुनकर मुझे याद आया....मैं भी बचपन में ढिबरी या लालटेन की रोशनी में पढ़ता था...मेरे पास एक लालटेन थी...शाम होते ही पहले उसका शीशा साफ करता था...कभी-कभी लालटेन की बाती यदि जली हुई होती तो जलते हुए लालटेन की बाती से धुँआ उठता और उसकी रोशनी भी तेज नहीं होती, तब उसकी बाती के जले भाग को काट कर फिर जलाता, अब लालटेन की उसी बाती से धुँआ रहित स्थिर लौ निकलने लगती और लालटेन की रोशनी भी तेज हो जाती....फिर लालटेन को अपने दालान के सामने टाँग देता...उसकी रोशनी देख मगन हो जाता...कभी-कभी हम-उम्र बच्चों के बीच लालटेन की रोशनी  को लेकर प्रतियोगिता भी हो जाती...मतलब मेरे लालटेन की रोशनी तुम्हारे लालटेन की रोशनी से तेज है टाइप का...
          वाकई, अब समय बहुत बदल गया है...ढिबरी और लालटेन का युग बहुत पीछे छूट गया है...तब का समय और परिस्थिति वैसी ही थी..आज के दौर में हो सकता है वही पुराना युग किन्हीं खास कारणों या परिस्थितियों वश कुछ खास लोगों या क्षेत्रों में देखने को मिल जाए लेकिन चीजें अब काफी हद तक बदल चुकी हैं..
             इस बदलाव में एक चीज बदलती हुई दिखाई नहीं देती, वह है... गरीब और गरीबी की बात करना..बल्कि आज भी यह उतनी ही शिद्दत के साथ राजनीति करने का हथियार बनी हुई है...यही नहीं, पेट्रोल खरीदते-खरीदते सात रूपए प्रति लीटर से सत्तर रूपए प्रति लीटर तक आ पहुँचा हूँ और आज हम एक बार में पहले से दस गुना ज्यादा पेट्रोल भरवाते हैं...लेकिन फिर भी हम गरीब की राजनीति के प्रति कुछ अधिक ही आकर्षित होते हैं...
          वैसे भी आजकल राजनीति की हवा बहुत तेज बह रही है..यह हमें और आपको अपने-अपने तरीके से आकर्षित करती है.. हम इस राजनीति के आकर्षण में खो जाते हैं.. आइए! राजनीति की हवा के सुरसुरे-पन का मजा लीजिए.. गरीबी-वरीबी तो आती-जाती रहती है..राजनीति में बहुत गर्मी होती है..चलिए हम राजनीति तापें...