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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

पुराने जमाने की एक कहानी

सोचता हूँ पुराने जमाने की एक कहानी आप को सुनाएँ...लेकिन जब आप ध्यान से सुने तब तो, आप ध्यान से सुन रहे हैं न..? तो लीजिए सुनिए....
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               तो बहुत पहले की बात है एक राजा था..(अरे भाई बहुत पहले एक राजा ही तो होता था) उसका राज्य काफी विशाल था..(तो राज्य क्या भारतवर्ष था?)..अरे भाई! पहले कहानी सुनो टोंको मत..! तो राजा को इतने बड़े राज्य पर राज करने में बहुत कठिनाई हुआ करती थी...(तो राजा होना क्या बच्चों का खेल है..?).. बीच में फिर बोले...! हाँ तो राजा को कठिनाई इस बात से होती कि उसके राज्य की प्रजा बहुत जल्दी किसी के बहकावे में बहक जाती..(गोया...राजा न होकर वह कोई पाँच साला जनता द्वारा चुनी सरकार का मुखिया रहा हो..कि जनता के नाराज हो जाने से कुर्सी जाने का खतरा हो..?) अरे भाई! कहानी पूरी हो तब कयास लगाएँ..! जनता के बहक जाने से उस राजा की कुर्सी जाने का खतरा रहता था। उस राज्य में राजा को कुर्सी पर विराजमान रहने के लिए समय-समय पर प्रजा से सहमति प्राप्त करना जरूरी होता...चूँकि जो राजा होता है वह खानदानी भी होता है...या वंशपरंपरा के प्रसादपर्यन्त राज करता रहता....तो वह राजा अकसर वंशपरंपरा के पुरखों का जबर्दस्त महिमामंडन अपने प्रजा के समक्ष करता करता रहता। प्रजा भी उस राजघराने के प्रति श्रद्धावनत रहती...अन्त में वर्ष दर वर्ष गुजरते रहे और राजा इतने बड़े राज्य पर आसानी से राज करता रहा...(आपकी कहानी झूठी है..इतने समय तक कोई राजा, राजघराने के प्रति प्रजा के श्रद्धाभाव के कारण राज कर सकता है..?) अरे भाई! पहले पूरी कहानी तो सुन लीजिए...!
           राजा अपने राज्य की जनता (जनता नहीं प्रजा..!हाँ..हाँ..वही..प्रजा..!) के लिए लुभावने काम करता....कहता.. हम तुम्हें भी अमीर बना देंगे...लेकिन होता यह...कि बीच के लोग सारा माल झटक लेते बेचारे गरीब तो गरीब ही रहते...खैर..राजकाज चलते-चलते ऐसे ही कई वर्ष बीत गए..गरीबों से गरीबी दूर होने के लिए तैयार ही नहीं हुई... 
          उस दिन राजा बहुत गुस्से में था...अपने दरबारियों से सीधे गरीबी को ही बुलावा लिया...साथ में यह ताकीद भी की, कि गरीबी खुद चलकर आए और गरीब के साथ न आए...हुआ यही, उस दिन राजा अपने दरबारियों के साथ राजसिंहासन पर विराजमान था...गरीबी...राजा के दरबार में बडे़ शान से हाजिर हुई थी...जैसे राजा का उसे कोई परवाह ही न हो...वैसे, गरीबी को यह पता होता है कि जब तक राजा है तब तक मैं भी हूँ...मतलब राजा होता है प्रजा से..और प्रजा होती है गरीबी से...सो गरीबी राजा के सामने पूरी निडरता से हाजिर हुई...!
            राजा तो राजा ठहरा और वह भी सिंहासन पर बैठा हुआ राजा.! उसने गर्व से दरबारियों के ऊपर इधर-उधर निगाह डाला..(हाँ, जैसे कहना चाहता है कि देखो, गरीबी हमारे वश में है) और फिर गरीबी के ऊपर उसकी निगाह टिकी,  गरीबी को देखते हुए राजा के मुखारबिंदु से एक रोबीली आवाज प्रस्फुटित हुई...  
             "क्यों रे गरीबी..! तुझे मेरी जरा भी परवाह नहीं...मैंने इतने जतन किए, फिर भी तूने मेरे राज्य का परित्याग नहीं किया...और मेरी प्रजा को अभी तक परेशान कर रखा है..?"
          गरीबी तो गरीबी उसका राजा क्या बिगाड़ लेगा..वह राजा की बातों को सुनकर मुस्कुराने लगी..! गरीबी की इस मुस्कुराहट पर राजा को थोड़ा गुस्सा आया...वैसे राजा का यह विशेष गुण होता है कि बिना उसकी इजाजत किसी अन्य की मुस्कुराहट उसे पसंद नहीं आती...सो राजा अपने सिंहासन पर बेचैनी से हिलते-डुलते चिल्लाहट भरी आवाज़ में गरीबी को देखते हुए चिल्लाया...
         "रे गरीबी..तू मेरी तौहीन कर रही है... मैंने कितनी बार देश तुझे देश निकाले की दंडात्मक राजाज्ञा पारित किया लेकिन तू मेरी नहीं सुनती..? और यहाँ मेरे दरबार में खड़ी होकर मुस्कुरा रही है...!"
        इतना कह राजा गुस्से से कांपने लगा था...जैसे पहली बार राजा गरीबी को देखकर गुस्से में आया था..! राजा के मन्त्रिपरिषद के लोग तो जैसे सन्नाटे में आ गए थे...इधर राजा के इस गुस्से को देख गरीबी को भी थोड़ी चिन्ता हुई...बात यह कि, इतने वर्षों से इस राजा के राज्य में रहते-रहते इस राजपरंपरा से उसका लगाव होना स्वाभाविक ही था...राजा की उसे लेकर बदली भावभंगिमा को देख गरीबी को जैसे एहसास हुआ कि अब यह राजा बेवकूफी पर उतरने वाला है...वह राजा को समझाने को हुई कि राजा की क्रोध भरी वाणी उसे फिर सुनाई पड़ी....
          "रे दुष्ट गरीबी..!मेरी राजाज्ञाओं की विरोधिणी..!! तूने एक राजा और उसके राज्य का अपमान किया है...और मेरी प्रजा को भी तूने प्रताड़ित करने का काम किया है.. मैं अपने इस पुत्रवत प्रजा की भलाई और अपने राज्य के सम्मान को बरकरार रखने के लिए तुझे फाँसी दिए जाने का हुक्म देता हूँ..." 
             राजा के इस हुक्म पर गरीबी सिहर सी गई थी...उसे आश्चर्य हो रहा था राजा ने इतना कठोर कदम कैसे उठा लिया...! उसने देखा उस राज्य के तमाम मीडियामैन धड़ाधड़ अपने फ्लैश कभी राजा के चेहरे पर चमकाते तो कभी गरीबी पर फोकस करते...इन सब के बीच गरीबी किंकर्तव्यविमूढ़ सी राजदरबार में खड़ी थी...उसे अपनी चिन्ता नहीं थी उसे चिन्ता थी तो केवल इस राजा और इसके राज्य की..! उसे समझ है..कि... बिना मेरे..! राजा और प्रजा का यह खेल भी खतम हो जाएगा..और... इधर प्रलय आने का भी कोई चांस दिखाई नहीं पड़ रहा था..सूरज महाराज वैसे ही धरती का चक्कर लगा-लगा कर सरदी-गरमी और रात-दिन करते जा रहे थे...फिर इस राजा की मति क्यों मारी गई कि अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने पर उतारू है...? 
        हाँ... राजा के भरे दरबार में तमाम जगमगाती फ्लेशलाईटों के बीच खड़ी गरीबी, राजा के फांसी वाले आदेश पर यही सोच रही थी...
          इधर राजा का हुक्म सुनते ही ले दरबारियों मन्त्रियों- संन्त्रियों सहित सभी गरीबी को धर दबोचने हेतु दरबार के वेल में पहुँच गए.. सभी अपने-अपने तईं गरीबी को दबोच लेना चाहते थे...और राजा की ओर देखते भी जा रहे थे....जैसे सब राजा की नजरों में गरीबी से इस फाइट में अपना नम्बर बढ़ते देखना चाह रहे हों.... सभी मिलकर गरीबी को कालकोठरी की ओर लेकर चलने लगे थे...राजा के चेहरे पर तनाव स्पष्ट रूप से झलक रहा था....राजा ने आज की सभा को यहीं मुल्तवी कर दी....
                        
                    इधर राज्य में चारों ओर, राजा द्वारा गरीबी को फांसी दिए जाने की चर्चा चल पड़ी थी...प्रजा का अपार समर्थन राजा के प्रति हो चुका था...अगले कुछ वर्षों तक वह निष्कंटक और राज कर सकता था....
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                  हाँ...उस दिन राजा अपने राजमहल में आराम फरमा रहा था...राज्याधीन खबरिया विभाग की रिपोर्टें भी पढ़ता जा रहा था... सब जगह राजा की जै-जैकार मची हुई थी...न जाने क्यों राजा करवट बदल मुँह विसूरते हुए सोने का प्रयास करने लगा था.... वैसे, राजा लोग होते तो समझदार ही हैं... नहीं तो राजा कैसे बनते..? गरीबी को फांसी सुनाकर राजा भी किसी न्यायाधीश की तरह अपना कलम तोड़ बैठा था...जैसे न चाहते हुए गरीबी को फांसी देनी पड़ी हो...और...यह सोचकर अपने पापबोध से परेशान हो उठा था...
                ...इसी बीच राजा के शयनकक्ष के दरवाजे पर ठक-ठक की आवाज हुई...कोई राजा से इसी वक्त मिलना चाहता था....राजा ने उस अपने खास व्यक्ति को शयनकक्ष में अाने की अनुमति प्रदान कर दी....शयनकक्ष में प्रवेश करते ही उस व्यक्ति ने राजा से कहा, 
         "हुजूर...! आपको हाईकमान ने याद किया है..अभी और इसी वक्त...!!" इसके बाद वह व्यक्ति मुड़कर गायब हो गया।
             राजा से भी बड़ा हाईकमान..! हाँ..राजा से भी बड़ा हाईकमान होता है..इस राज्य में..! (हाईकमान राज्य में प्रजा द्वारा स्वीकृत किसी वंशपरंम्परा टाइप रजघराने का मुखिया होता है...जिसे किसी विशेष परिस्थिति में कभी स्वयं राजा, तो कभी हाईकमान बन जाने का अधिकार प्राप्त होता है..प्रजा इस वंशपरंम्परा का बहुत आदर करती है )। तो, इस राज्य का यही सुपरनेचुरल हाईकमान, गरीबी को फांसी की सजा सुनाए जाने पर सक्रिय हो गया था...जिसकी सलाह के बिना राजा ने गरीबी को फाँसी की सजा सुनाई थी...राजा की इस चूक से हाईकमान के नाराज होने का खतरा उत्पन्न हो गया था..और राजा को यह बात पता थी कि हाईकमान के विश्वासपर्यन्त तक ही वह राजा बना रह सकता है...वह झटपट शयनकक्ष से निकल कर हाईकमान की ओर चल पड़ा...
             हाईकमान का दरबार सजा हुआ था....स्वयं हाईकमान सबसे ऊँचे आसन पर आरूढ़ था...राजा के सारे दरबारी और मन्त्रीगण वहाँ अपनी महत्तानुसार हाईकमान के आसपास ऊँचे-ऊँचे आसन पर विराजमान थे...हाईकमान के इस दरबार में राज्य के कोने-कोने से आए कुछ चुनिन्दा किस्म के कारिंदे टाइप लोग भी नीचे आसन पर जमे हुए थे....इधर गरीबी भी इस सजीले दरबार में अपनी पूरी सजधज के साथ आ कर खड़ी थी...राज्य के कुछ महत्वपूर्ण संन्त्री उसके लिए सुरक्षा का घेरा बनाए हुए खड़े थे.....
             राजा ने इस दृश्य को देखा... इस दरबारी दृश्य को देखकर वह भौंचक था..! उसे अपनी आँखों पर जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था...कि...अभी जिस गरीबी को उसने फांसी की सजा सुनाई थी...वही गरीबी....राज्य के संन्त्रियों के सुरक्षा घेरे में हाईकमान के समक्ष यों खड़ी मिलेगी..? राजा अपनी आँखें मलमलकर इस दृश्य को देखने लगा था...
            भौंचक राजा हाईकमान के समक्ष आकर खड़ा हो गया...इस दरबार में राजा को बैठने के लिए आसन भी नहीं उपलब्ध कराया गया...जैसे राजा के हाथों कोई बहुत बड़ा गुनाह हुआ हो और राजा हाथ बाँधे हाईकमान के समक्ष काटो तो खून नहीं जैसी हालत में खड़ा था...उसने देखा, जो दरबारी राजदरबार में बिना उसकी आज्ञा आसन नहीं ग्रहण करते थे वही, यहाँ इस दरबार में बिना उसकी परवाह किए आसन पर बैठे हैं...? 
             खैर....राजा की तंन्द्रा टूट चुकी थी हाईकमान की कड़कती आवाज सुनकर..! राजा ने हाईकमान के आग्नेय हो चुके नेत्रों की ओर देखा...और उनके सम्बोधन को इस दरबार में खड़े-खड़े ही सुनने लगा.....वाकई!  यह आश्चर्य की ही बात थी कि इतने महान राज्य का राजा यहाँ इतनी निरीहता से खड़ा था...!!

             हाईकमान की यह आवाज राजा के कानों में गूँजी...
             "तुम्हें पता है राजा होने के मायने..? मैंने तुम्हें राजा, राजमद में चूर होने के लिए नहीं बनाया था...कि...तुम अपने राजमद में गरीबी को ही फाँसी देते फिरो..? अरे बेवकूफ..! यहाँ तो राजा बनने वालों की तो लाइन लगी है..लेकिन मैंने सोच समझकर तुम्हें राजपद दिया था..कि...तुम सीधे-सज्जन और ज्ञानी तथा कम बोलने वाले हो...हमारी भावी पीढ़ी के योग्य होने तक राजकाज सुरक्षित चला लोगे...!
         ..... लेकिन तुम किसी राजा और उसके लिए प्रजा होने की महत्ता भूल गए...तुम्हें पता है..! जब प्रजा ही नहीं होगी तो राजदरबार किसके लिए सजाओगे...और फिर मेरी काहे की हाईकमानी...? यह दरबार और दरबारी...मन्त्री..संन्त्री..और...मेरे दूर-दराज तक के कारिंदों की शान...सब इस बेचारी गरीबी के ही कारण है...! जब तक गरीबी है हम सब हैं...और हमारा राज है...समझे..!"
           हाईकमान के सामने हाथ बाँधे खडे़-खड़े राजा ने बड़ी ही बेचारगी के अंदाज में संन्त्रियों की सुरक्षा में इठलाती..मुस्कुराती खड़ी गरीबी की ओर निहारा....राजा उसे देख एकबारगी तो फिर चिढ़े लेकिन अगले ही पल चिहुँक कर गरीबी को देख मुस्कुराने लगे..जैसे, अपने साहब को देख न चाहते हुए भी कोई मातहत मुस्कुराने लगता है...वाकई! ये मुस्कुराहटें भी न, होती हैं बड़ी लाजवाब ही..! इधर दरबारियों के चेहरे मुस्कुराहटों से खिल उठे थे।
         अचानक हाईकमान की आवाज फिर गूँजी....
         "सुनो राजाधिराज जी...! जाओ गरीबी को फांसी देनेवाली अपनी राजाज्ञा वापस लो....और....गरीबी को स्वतंत्र करो...जिससे ..मेरे ये कारिंदे, दरबारी, मन्त्री, संन्त्री सब मिलकर गरीबी दूर कर सकें और इन्हें भी गरीबी दूर करने का श्रेय मिलना चाहिए...आखिर..जब सब मिलकर गरीबी दूर करेंगे तभी गरीबी दूर होगी...गरीबी दूर करने का अधिकार सभी को है...मैंने तुम्हें राजा बना कर भूल की है...तुम्हें राजनियमों की इत्ती भर जानकारी नहीं...?  राजा को कभी श्रेय लेने के लिए कार्य नहीं करना चाहिए....तुम्हें श्रेय देने का सर्वाधिकार हमारे पास सुरक्षित है...!"
         हाईकमान ने जैसे ही अपनी वाणी को विराम दिया..तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा सभाकक्ष गूँज उठा...सभी दरबारी वाह..वाह..कर उठे...इधर राजा अपना थूँक निगलते हुए मिमियाती सी आवाज में हाईकमान से बोले...
            "जी...जी...पर...सर..सर.., लोग कहेंगे कि गरीबी को हमने बचाया है...इसमें प्रजा के नाराज होने का खतरा भी है...इससे भी हम-आप असुरक्षित हो चुके होंगे...वैसे भी...आजकल..गरीबी के विरोध में तमाम दवाब समूह उभर आए हैं...क्रान्ति संभावित...सी..!"
             राजा की बात से दरबार में थोड़ी देर के लिए सन्नाटा पसर गया..फिर दरबारियों में ही आपस में गुफ्तगू होने लगी...अचानक हाईकमान का स्वर फिर उभरा....
           "देखो...अब तक हमारी वंशपरंपरा से ही राजा बनते आए हैं...और सभी ने गरीबी हटाने के लिए काम किए लेकिन, इनमें से किसी ने भी गरीबी को फांसी पर नहीं चढ़ाया...यह गरीबी प्रजा के सानिध्य में और उनके पास ही रहती है...और प्रजा जब-तब गरीबी हटाए जाने का सुख भोगती रहती है...हमारे गरीबी हटाने के प्रयास को देखकर ही प्रजा हमको ही राजा मानते आई है...इस बात को तुम्हें समझना चाहिए...और...रही बात क्रान्ति की तो..! तो हमने प्रजा को तमाम अधिकार दिए तो हैं..वह काहे नहीं अपने इन अधिकारों का प्रयोग करती..? सूचनाधिकार से प्रजा स्वयं अपनी गरीबी हटा सकती है...इतने अधिकार सम्पन्न होने के बाद हमारे राज्य की प्रजा कभी क्रान्ति नहीं कर सकती ..!"
           राजा हाथ बाँधे हुए हाईकमान की बात गौर से सुन रहा था ...लेकिन सभा बीच इठलाती गरीबी को देखते हुए बीच में बोल पड़े...
             "लेकिन सर जी...गरीबी न हटने से प्रजा के नाराज हो जाने का खतरा है...और वैसे भी राज्य में आपके तमाम विरोधी प्रजा के कान भरने शुरू कर दिए हैं... प्रजा के कान भरने वालों के खिलाफ हम कार्यवाही भी नहीं कर सकते...आपके विरोधियों का यह रामलीला मंचन नाटकीय होते-होते धार्मिक रूप ग्रहण करता जा रहा है...प्रजा दिग्भ्रमित सी हो जाती है...!"
          राजा की बातों को हाईकमान ने ध्यान से सुना और धीर-गंभीर आवाज में कहा,
           "राजन...(हाईकमान द्वारा यह" राजन" कुछ-कुछ "मोरे रजऊ" जैसा सम्बोधन लिए था) मैंने तो केवल गरीबी को फाँसी चढ़ाए जाने पर मना किया है...गरीबी दूर करने के प्रयास पर नहीं..! जाओ जाकर अपने अमले के साथ गरीबी दूर करने के अपने प्रयास को अपनी प्रजा को खूब दिखाओ...इसके लिए अपनी प्रतिबद्धता को बार-बार दुहराओ और कहो कि जो गरीबी दूर करने में अवरोध खड़ा करेगा उसके विरुद्ध कठोर से कठोर कार्रवाई होगी...सतर्कता कमेटियों का गठन करो...सतर्कता आयुक्त बनाओ...अपने अमले को इसके अधिकार क्षेत्र में खड़ा करते हुए प्रजा को दिखाओ ..गरीबी दूर करने में किसके स्तर से किस स्तर की कोताही की गई थी...इसकी जाँच कराओ...मेरा तो यह भी आदेश है कि राजा स्वयं को भी इस जाँचाधिकार में सम्मिलित करे...देखना...! यह तुम्हारी जो प्रजा है न, तुम्हारे गरीबी दूर करने की इस मुहिम से जबर्दस्त खुश हो जाएगी...!! आखिर, जनता को कुछ होते हुए दिखाई पड़ जाएगा...! फिर समवेत रूप से सबकी गरीबी दूर होगी..जनता खुश होगी...जैसे मोगैम्बो खुश हुआ था..और हाँ..प्रजा के साथ-साथ कुछ अपनी भी चिन्ता किया करो.."
               राजा....हाँ..हूँ के अन्दाज में हाईकमान की बात सुनता रहा...उसने उड़ती हुई सी निगाह हाईकमान पर डाली...हाईकमान से कुछ लोग अपने को सतर्कता आयुक्त बनाए जाने की सिफारिश भी करते दिखाई देने लगे थे..खासकर अभी तक पदविहीन रहे कारिंदों की इसके लिए लाईन सी लग गई ..कई कारिंदों ने तो इसी चक्कर में राजा को भी धकिया दिया...हर स्तर की तमाम सतर्कता आयोगों, कमेटियों में पद लेने की होड़ सी मच उठी थी..हाईकमान और समृद्ध हो उठा था...
         ..... इधर....गरीबी की ओर से सबका ध्यान भंग हो चुका था...गरीबी को जैसे ही अपनी इस आजादी का बोध हुआ वह भी अपने लिए सर्वाधिक सम्मानित स्थल प्रजा-निवास की ओर चुपके से निकल पड़ी...
            इस राज्य का यह राजा अब चुपचाप अकेले ही हाईकमान के दरबार से बाहर अपने राजमहल की ओर चल पड़े... उन्हें जाकर तुरन्त बिस्तर पर पड़ जाना था...सोना था...लेकिन रास्ते में तमाम मीडिया मैन उनके मुँह पर अपने-अपने माइक लगाए बस एक ही प्रश्न दोहरा रहे थे...
             "तो महाराज...! गरीबी को फाँसी पर चढ़ाने के लिए कौन सी तिथि निर्धारित की गई है..?"
             राजा मौन इस प्रश्न की अनसुनी करते हुए अपने शयनकक्ष की ओर अपने डग अब और तेजी से बढ़ाने लगा था....
     (.....यह कहानी थी पुराने जमाने के एक राजा की...आगे अवसर मिला तो इसी राज्य की आगे की कथा सुनाएंगे...)
                       --Vinay 
                         4/12/16