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सोमवार, 19 दिसंबर 2016

घोटाले बिन सब सून

            एक बार किसी कार्यालय के एक छोटे साहब ने बास से छुट्टी माँगने का अपना एक वाकया मुझे सुनाया। वे छुट्टी की अर्जी देने अपने बास के पास गए थे। तब उनके बास ने छुट्टी का उनका अपलीकेशन फेंकते हुए उनसे कहा था -
           "बडे़ आए छुट्टी लेने..! जेब में कुछ होगा तभी घर, परिवार रिश्तेदार भी पूँछेंगे..नहीं तो वहाँ कोई पूँछनेवाला भी नहीं मिलेगा..का करोगे छुट्टी लेकर..!" 
             बेचारे वे छोटे साहब, मन मसोसकर, अपना खाली जेब टटोलते बास के चैम्बर से बाहर निकल आए थे। बास ने छुट्टी का अपलीकेशन फेंका, छोटे साहब को इससे कहीं ज्यादा मलाल अपना खाली जेब टटोलकर हुआ रहा होगा। इसके बाद, छुट्टी लेने के प्रति उनके मन में उचाट पैदा हो गया। और इसी उचाट मन से सुदूर अंचल के अपने कार्यालय के वियावान परिसर में, जाड़े की एक रात, वे चौकीदार के साथ अलाव ताप रहे थे। वैसे भी, खाली जेब वाले वियावान में ही ठेले जाते हैं। इस पसरे वियावान के प्रभाव में, छोटे साहब के निपट अकेले मन को भाँपकर चौकीदार ने उनसे कहा -
             "अरे साहब! आप से पहले वाले जो साहब यहाँ थे उनकी तो कुछ पूँछिए ही मत, उनके रहने पर तो, इस समय भी ऐसे वियावान में मेला लगा रहता था..पर जब से आप आए हो, सब सून हो गया है..न कोई गाड़ी न कोई घोड़ा..न लोग..!"
              चौकीदार की बात से साहब को चोट पहुँची, मतलब, चौकीदार भी इस वियावान में उनसे, साथ देने की कीमत वसूलना चाहता है। ऐसे में, अलाव की गर्मी पर जेब की ठंडक भारी पड़ी और वे अलाव तापना छोड़ उसी परिसर स्थित अपने आवास में सोने चले गए। वाकई, जेब के ठंडकपने में अलाव-फलाव भी काम नहीं करता। 
                पता नहीं उन छोटे साहब ने अपने बास या चौकीदार से कुछ सीखा भी था या नहीं। लेकिन हमें तो उन छोटे साहब के बास की बात में दम नजर आता है, बास की बातें सोते हुए को जगाने वाली जैसी थी। ऐसा बास पथप्रदर्शक होता है, वह दुनियाँ में चलने की राह दिखाता है। ऐसे ज्ञानी शुभचिंतक बास से अपनत्व का भाव पैदा होना स्वाभाविक है और उनकी जगह मैं होता तो उस बास से अपनत्व स्थापित कर लेता। वहीं, उस चौकीदार का परसेप्शन भी कमाल का था। चौकीदार को यह समझ है कि चारा फेंकने वालों के लिए जंगल में भी मंगल होता है। उसे पता है, असली मजा चरिए और चराइए में है। मतलब, जहाँ चरने और चराने वाले होते हैं, वहीं जंगल में मंगल होता है। 

             वाकई, जेब में सूनापन तो जग में सूनापन और इस सूनेपन से कुछ-कुछ वैराग्य टाइप का मन हो आता है। जेब का खालीपन, मन पर इच्छाओं का भस्म लपेटकर व्यक्ति को वीतरागी बना देता है। लेकिन किसी समाजी का ऐसे वीतराग से काम नहीं चलता, उसे छुट्टी लेनी पड़ती है, घर,परिवार, समाज देखना होता है और इसके लिए जेब का जलवेदार होना जरूरी है। इस भवसागर में आनंदानुभूति जेब के जलवे के साथ ही उठाई जा सकती है और यह आनंदानुभूति घपले-घोटाले की वैतरणी में उतर कर ही प्राप्त की जा सकती है। वैतरणी के उस पार तो निपट सूनापन है, जबकि इस वैतरणी में बहकर सीधे भवसागर की आनंदानुभूति प्राप्त होती है और ऐसी वैतरणी में गोता लगाने वाले को यह जग, "खुले ख्यंम्भु दुआर" टाइप का जगमग-जगमग करने लगता है। फिर, छुट्टी क्या, यही बास बिन मांगे स्पेशल-लीव तक देने को तैयार खड़ा मिलता है, और तब पूँछनेवालों की तो पूँछिए ही मत..!"
              अब यह भी स्वयंसिद्ध अनुभव है कि जेब में माल बिना घपले-घोटाले के आ ही नहीं सकता। मतलब, जो घपले-घोटाले में लुल्ल उसका जेब सुन्न। घोटाले और जेब में चहल-पहल के बीच अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।  
             लेकिन मैं यहाँ थोड़ा कन्फ्यूज हूँ, वह कि, उन छोटे साहब को छुट्टी क्यों नहीं मिली..क्या वे घपले-घोटाले का मर्म नहीं समझ पाए थे? और अपनी बेवकूफी के कारण वियावान में अकेले ही झख मार रहे थे? मुझे लगता है उन छोटे साहब को वह अदना सा चौकीदार भी समझाने की ही कोशिश कर रहा था।
             वैसे जरूर उन छोटे साहब को घपले-घोटाले का मर्म पता नहीं रहा होगा या फिर घपले और घोटाले में किसी एक को चुनने के बीच उलझे रहे होंगे। अगर वे मुझसे सलाह लेते तो मैं उन्हें घपले करने की सलाह देता, क्योंकि घपले में, घपले करने की संभावना घपले कर लेने के बाद भी बना रहता है। वहीं, घोटाले करने में घपला करने की संभावना क्षीण होती है। यहाँ घोटाले को घपले से व्यापक माना जाना चाहिए। कई घपले मिलते हैं तब कोई एक घोटाला बनता है।

            ऐसे में, मैं उन छोटे साहब को यही सलाह देता कि भाई, छोटे टाइप के साहब को घपले में ही विश्वास रखना चाहिए। क्योंकि घोटाले करने का सर्वाधिकार बड़े किस्म के साहब के पास होता है। या फिर घोटाले के लिए बडे़ साहब से पूर्वानुमति प्राप्त होनी चाहिए। एक सफल घपलेबाज में बडे़ साहब के प्रेरणाभाव को पहचानने की समझ और क्षमता भी होनी चाहिए। मतलब, एक ओहदेदार को अपनी औकात के अनुसार एक-दूसरे का सम्मान करते हुए घपले-घोटालों को अंजाम देना चाहिए। वैसे भी किसी ओहदेदार के आसपास चहल-पहल उसके घोटाले कर लेने के औकातानुसार ही होती है। 
             अगर वे छोटे साहब इस पर भी न समझ पाते तो, मैं आखिर में, उन्हें यही समझाता कि घपला ही घोटाला है और घोटाला ही घपला है। छोटा साहब इन दोनों में से कुछ भी करे, लेकिन यदि बड़े साहब आँख तरेरें तो उसे दुलराहट के साथ बड़े साहब की थोड़ी लल्लोचप्पो कर लेनी चाहिए। फिर तो, बडे़ साहब इसे छोटे का उत्पात समझकर उस पर लाड़ बरसाना शुरु कर देंगे, जो रोजमर्रा का खेल हो जाता है। 

              वैसे भी अपने यहाँ एक मान्यता है कि "क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात"। फिर तो, छोटा घपला करे या घोटाला, बड़े के लिए यह उत्पात टाइप का ही होगा, और बड़ा भी अपनी शोभा की खातिर इसके लिए छोटों को क्षमा कर देता है।
          
             तो, छोटे साहब को हमारी यही सलाह होती कि चाहे घपला करो या घोटाला। इससे न डरो और न हिचको। घपला या घोटाला कोई कुछ कहे, बडे़ के सामने माना यह उत्पात ही जाएगा, और किसी छोटे द्वारा किया गया उत्पात क्षम्य माना जाता है, बशर्ते इस उत्पात से बड़े के जलवे में कोई खलल न पहुँचे। छोटा या बड़ा, इन ओहदेदारों के बीच घपले-घोटाले का खेल इनके बीच का आपसी लाड़-प्यार ही होता है। इसी लाड़-प्यार से इन ओहदेदारों का जीवन सदैव चहल-पहल से गुंजायमान रहता है।
              तो वियावान वाले छोटे साहब को मेरी अन्तिम सलाह यही होती कि लाड़-प्यार सीख कर जीवन में चहल-पहल हेतु घपले-घोटाले करने की क्षमता विकसित कर लेनी चाहिए। इससे जीवन का सूनापन, गधे के सिर से सींग जैसा गायब हो जाता है। और घोटाले कर लेने के बाद आत्मविश्वास इतना बढ़ जाता है कि वह एक सफल ओहदेदार बन, बैकबेंचर से फ्रंटलाइनर बन जाता है। आँख चुराने की तो दूर की बात अब उसमें बड़े साहबों की आँखों में आँख डालकर बात करने की हिम्मत भी आ जाती है और यह घपले-घोटाले का ही महात्म्य होता है। तभी किसी ने कह दिया है कि बिन घोटाला सब सून। 
              खैर अभी तक मेरी सलाह छोटे साहब के लिए ही थी। यहाँ बड़े साहब की भी यह चिन्ता हो सकती है कि उन्हें कौन क्षमा करेगा? इस पर मेरी बड़े साहबों के लिए यही सलाह है कि, यहाँ हर बड़ा अपने बड़े के सामने आटोमेटिक छोटा होता जाता है ; और ऐसी ही एक शृंखला बनती जाती है, चूँकि लोकतंत्र का जमाना है तो इस शृंखला में सबसे बड़ी यहाँ की जनता हुई, और इस प्रकार यह "क्षमाभाव" इसी शृंखला की सवारी करते हुए जनता तक पहुँच जाती है! और क्षमा की भरी पूरी गठरी इसी जनता के सिर-मत्थे जाकर अटकती है..! अब लोकतंत्र में जीनेवाली यह जनता स्वयं जनार्दन भी होती है इसलिए यह जनता किसी से क्षमापेक्षी नहीं होती। जनता भगवान भरोसे होती है।
          तो, छोटे और बड़े दोनों साहबानों को मेरी यही सलाह है "चिंता छाँड़ि अचिंन्त्य रहौ, सांई है समरत्थ" जनता जनार्दन सांई बन सबको आशीर्वाद देती रहती है। मतलब छोटे-बड़े के जलवे ही जलवे हैं और ये जलवे घपले-घोटाले के ही थ्रू है।
                                                  - Vinay 
                                                   (18.12.16)