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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

मेरे फनछाया वाले भगवान

            आजकल लोग नोटबंदी के संकट में फँसे पड़े हैं और इधर हम हैं कि लक्ष्मी और विष्णु की एक मूर्ति को लेकर संकट में फँसे पड़े हैं। मेरे समझ में नहीं आ रहा है कि इस मूर्तिद्वय में लक्ष्मी की मूर्ति का स्थान कहाँ निर्धारित करें। मेरे समक्ष संकट कुछ-कुछ शेषनाग के कारण भी उत्पन्न हुआ है। यहाँ क्षीरसागर में शेषनाग न जाने क्यों अपने फन की छाया भगवान विष्णु पर ही किए रहना पसंद करते हैं और लक्ष्मी जी इनके फन की छाया के सुख से वंचित जब देखो तब विष्णु के पैंताने उनका पैर दबाते दिखाई देती हैं, पता नहीं स्वर्गलोक की कैसी रीत है?
          मेरी समझ में लक्ष्मी के ऊपर भगवान विष्णु का यह घोर अन्याय है ; विष्णु द्वारा लक्ष्मी का अपमान है। स्वर्गलोक के ये देवता जैसे किसी अहमन्यता के शिकार हैं, अन्यथा लक्ष्मी जी विष्णु के साथ शेषनाग की फनछाया में सदैव दिखाई देती उनका पैर न दबा रही होती। लक्ष्मी के इस अघोषित अपमान के पीछे स्वर्गलोक में नोटों का प्रचलन न होना ही जान पड़ता है। स्वर्गलोक के देवता बिना नोट खर्च किए ही सारे मजे लूटते हैं, इसीलिए लक्ष्मी जी के महत्व को वे नहीं समझते। हो सकता है शेषनाग की फनछाया से लक्ष्मी जी के वंचित होने के पीछे यही कारण हो? वहीं भूलोक स्थित हमारे देश में गड़े या किसी तहखाने में छिपायी गई धनलक्ष्मी तक की नाग-नागिन रक्षा करते हैं, मजाल है कि कोई वहाँ फटक पड़े। खैर..
           स्वर्गलोक में लक्ष्मी की ऐसी उपेक्षा पर मुझे एक हमारी ही पुरानी बात याद आती है, तब हमारी श्रीमती जी नई-नई आयीं थी। उन्होंने किसी देवता की, जिसकी वे पूजा कर सकें, तस्वीर लाने के लिए मुझसे कहा था। मैं दौड़ा-दौड़ा बाजार से कई देवताओं की तस्वीरें खरीद लाया था। मतलब, बाजार में भगवान भी विभिन्न वैरायटियों में उपलब्ध रहते हैं और हमें बाजार से अपने भक्ति-भाव के अनुरूप किसी भी वैरायटी के भगवान खरीदने की स्वतंत्रता रहती है।
         बाजार की बात पर ध्यान आता है, इस बाजार की महिमा अपरम्पार, बाजार भी अपने तरीके का लोकतंत्र है। जहाँ बाजार न हो मान लीजिए वहाँ लोकतंत्र नहीं है। हम तो कहते हैं चीन आज का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है जो अमेरिका की बराबरी पर उतर आया है। चीन यह सब बाजार के बलबूते ही कर पा रहा है। यह देश भी अब बाजार में ढल चुका है। वैसे भी जब हर जगह कम्युनिस्ट मर चुका है तो चीन में कैसे राज करता? चीन में कम्युनिस्ट नहीं बाजार का राज है, बाजार सबसे बड़ा लोकतंत्र है। थ्येनानमन चौक कांड के बाद चीन में यह बाजार ही राहत लेकर आया था। हाँ, विषयांतर ठीक नहीं पहले अपनी बात कर लें। 
            तो श्रीमती जी को पूजा करना था और हम उनकी भक्तिभावना से तब तक लगभग अपरिचित से ही थे, सो उनकी पूजा के लिए कई देताओं की तस्वीर खरीद लाए! यहाँ एक बात मानना होगा हम भारतीय वाकई बेहद लोकतांत्रिक होते हैं, मतलब हम अपनी इच्छानुसार अपने-अपने भगवान भी चुन सकते हैं। इसी बात पर तो हमें अपने भारतीय होने पर भी गर्व है। मतलब तुम हमारी नहीं सुनोगे तो हम भी तुम्हें छोड़कर अपना दूसरा भगवान चुन लेंगे, क्या पता भगवान भी इस बात से डर कर अपने भक्तों की खूब सुनते हों? और हो सकता है कुछ लुभावनी घोषणाएँ भी कर देते हों? नेता की नेताई भी ऐसी ही समस्या से जूझती है, इसीलिए तो ये चौबीसों घंटे के चकल्लस में लगे रहते हैं कि भक्तगण अपना पाला न बदलें। खैर.. 
            देवताओं की उन कई तस्वीरों में से श्रीमती जी को शेषनाग की फनछाया के नीचे समान आसन पर विराजमान लक्ष्मी-विष्णु की तस्वीर पसंद आई थी। विष्णु के पैर दबाती लक्ष्मी जी की छवि को श्रीमती जी पूजा के योग्य नहीं मानती, स्त्री को अपमानित करती टाइप इस छवि की पूजा करना उनकी दृष्टि में उचित नहीं था। आखिर किसी के देवता होने से उसे देवी के अपमान करने का अधिकार नहीं मिल जाता। तभी से मैं भी सावधान होकर नारी-स्वातंत्र्य और गरिमा का हिमायती बन गया था। फिर उनने पूजा के लिए लक्ष्मी-विष्णु की उस तस्वीर को फ्रेम में मढ़ा कर पूजा की चौकी पर स्थापित कर लिया तब से वर्ष दर वर्ष बीतता रहा और वे इसी तस्वीर की पूजा करती रहीं। 
             इधर नोटबंदी की घटना के पूर्व संयोगवश एक मूर्तिकार से मेरी भेंट हो गई थी। पूजा वाली फोटो की ही तरह लक्ष्मी-विष्णु की वैसी ही मूर्ति बनवाने की इच्छा जागृत हुई, आखिर इतने वर्षों से पूजावाली उस तस्वीर से प्रगाढ़ हो चुका था मेरा भी लगाव। लेकिन मूर्तिकार ने वही क्षीरसागर वाली शेषशैय्या पर आराम फरमाते भगवान विष्णु का पैर दबाते लक्ष्मी की मूर्ति गढ़ दी। इसे देख श्रीमती जी ने कह दिया, "पूजा के लिए यह मूर्ति उचित नहीं है..मैं इस मूर्ति की पूजा नहीं कर सकती...पूजा के लिए वही तस्वीर जैसी मूर्ति चाहिए।" खैर, उनकी भावना समझते हुए मूर्तिकार से मैंने पूजा वाली तस्वीर जैसी मूर्ति गढ़ने के लिए पुनः कहा। इसी बीच नोटबंदी लागू हो गई और इधर मूर्तिकार मूर्ति भी गढ़ लाया था। 
              1000-500 के नोट बंद! इस नोटबंदी का मुझपर जबर्दस्त असर पड़ा था। उस दिन रात बारह बजे के बाद मेरे भी ये नोट कागज के टुकड़े मात्र रह गए थे। उस मूर्तिकार से मूर्ति लेने की इच्छा नहीं हो रही थी, अचानक मूर्तिकार को दिया अपना वचन याद आया। और फिर रिजर्व बैंक के गवर्नर तो हम हैं नहीं कि वचन देकर मुकर जाएँ..! सोचा, मूर्तिकार को उसके गढ़े मूर्ति का प्रतिफल तो मिलना ही चाहिए। इस बात पर मुतमईन होने पर कि मूर्तिकार द्वारा मूर्ति के निर्धारित मूल्य से किसी किस्म के काले धन के सृजन की कोई गुंजाइश नहीं है मैंने मूर्ति लेने की सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर दी। मूर्ति का मूल्य चुकाने हेतु मैंने दस दिन का समय भी लिया, मरता क्या न करता के अन्दाज में मूर्तिकार भी इसके लिए तैयार हो गया। इधर नोटबंदी में अपने काले सफेद की सीमा भांपकर मूर्तिकार से क्षीरशायी छविवाली मूर्ति वापस कर दिया। हालाँकि शोपीस के लिए यह मूर्ति मैं लेना चाहा था लेकिन नोटबंदी से मेरी क्रयशक्ति क्षीण हो चुकी थी।
            इस नोटबंदी से जैसे बाजार को लात ही पड़ गई हो, अब अगर बाजार क्षीण तो लोकतंत्र भी कमजोर हुआ है। मैं तो कहता हूँ, लोकतंत्र की आत्मा बाजार में ही निवास करती है। आज देखिए तो चीन में लोकतंत्र तो भारत में कम्युनिस्ट टाइप का माहौल पसरा हुआ है। लोकतंत्रवादी दल चिचिया रहे हैं, क्योंकि उनके नारों को कोई दूसरा चालाकी से हथिया लिया हो, भई, यह तो सरासर चीटिंग टाइप का है। खैर..
            मूर्तिकार द्वारा दूसरी बार गढ़ कर दी गई मूर्ति का मैं निरीक्षण करने लगा था। लेकिन यहाँ भी वही गड़बड़ी पूरी फनछाया में चतुर्भुज विष्णु जी विराजमान थे, लक्ष्मी जी को तो मूर्तिकार ने इस छाया के किनारे लगभग बाहर की ओर ही बैठा रखा था। तो क्या लक्ष्मी जी फनछाया पसंद नहीं करती? या जिसे हम आधुनिक सोच समझ रहे थे वही गलत है? आखिर इतना समझाने के बाद भी मूर्तिकार से यह गलती क्योंकर हो रही है? मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा है कि लक्ष्मी जी को विष्णु का पैर दबाना मंजूर है लेकिन फनछाया में रहना मंजूर नहीं है। रहें विष्णु फनछाया में! तो क्या लक्ष्मी जी फनछाया में रहने वालों के पैर दबाती हैं?...फिर तो लक्ष्मी जी की यह निरीहता है!
           लेकिन जो भी हो यह तो तय है लक्ष्मी जी को फनछाया में रहना मंजूर नहीं, बस इतना भर है कि वे फनछाया में रहने वालों की चेरी बन जाती हैं! आज अब यह बात समझ में आ रही है यह बाजार की ही कवायद है कि लक्ष्मी जी फनछाया में विराजमान हों, यह बाजार की महिमा है। जिनके पास फन है वही बाजार के पुरोधा हो चले हैं, लेकिन लक्ष्मी भी अब केवल इन्हीं की चेरी नहीं बनी रह सकती। तो ये फनवाले बाजार के पुरोधा, लक्ष्मी जी को अपनी फनछाया में रहने के लिए मजबूर करते हुए दिखाई दे रहे हैं। यही नहीं ये लक्ष्मी जी की लल्लोचप्पो कर येन-केन-प्रकारेण अपने कब्जे में लेना चाहते हैं। वैसे भी लक्ष्मी जी चेरी तो बन सकती हैं, लेकिन किसी फनछाया में रहना इन्हें भी मंजूर नहीं। इसीलिए भरे बाजार लक्ष्मी जी तड़फड़ाती हैं, बाजार में चलायमान रहना चाहती हैं। नोटबंदी एक तरह से प्राणवायु की तरह लक्ष्मी जी को फनछाया से मुक्त कर पुनः इनकी स्वतंत्रता की उद्घोषणा करने जैसा है। लेकिन ये फनवाले इस नोटबंदी को धिक्कार रहे हैं क्योंकि लक्ष्मी के बिना इस भरे बाजार इन्हें कौन पूँछेगा? बिना लक्ष्मी के ये निरीह हो जाएँगे। 
  
              खैर हम तो ठहरे आम आदमी हम तो लक्ष्मी और विष्णु दोनों को समान आसन पर फनछाया के नीचे बैठा कर खुश हो लेते हैं हमें फनछाया के राज पता नहीं, और विष्णु भगवान तो देवता पुरुष हैं उनकी बात ही कुछ और है। लेकिन ये किस किस्म के पुरुष हैं जो सदैव फनछाया के नीचे रहते हैं और लक्ष्मी जिनकी चेरी बनी रहती हैं? पता नहीं नोटबंदी में ये कैसा फील करते होंगे? शायद तब भी इन फनछाया वालों के लक्ष्मी जी पैर ही दबा रही होंगी। नोटबंदी से फनछाया के नीचे रहनेवालों पर कोई असर नहीं हुआ होगा। 
          प्रिय भक्तगणों! मैं भी भक्त ही हूँ..लेकिन मैं अपनी भक्ति के आत्मविश्वास में अपने भगवान से थोड़ा हँसी-मजाक भी कर लेता हूँ! मुझे विश्वास है, मेरे भगवान इतने हलके नहीं हैं कि अपनी फनछाया से निकल मुझपर ही पिल पड़े। वे स्वर्गलोक वाले भगवान मेरी बात पर बस मुस्कुरा रहे होंगे और कुछ नहीं। - Vinay