लोकप्रिय पोस्ट

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

मन के मुगालतों की मगरूरी से बचिए

          उस दिन मेरे ड्राइवर ने गाड़ी दौड़ाकर बस पकड़ाया था। बस में खाली सीट न देखकर कंडक्टर वाली सीट पर पहले से बैठे एक बुजुर्ग टाइप सज्जन के बगल में बैठ गया था। कंडक्टर पीछे की सीटों के पास जाकर टिकट बना रहा था। यह सोचकर "हममें से किसी एक को इस सीट से उठना पड़ेगा" कंडक्टर की सीट पर बैठने में मुझे थोड़ा संकोच भी था। मैंने बगल में निश्चिंत से बैठे हुए उन सज्जन की बुजुर्गियत भाँपते हुए पुनः सोचा था, "उठना तो हमें ही पडे़गा..खैर तब की तब देखी जाएगी" और टिकट बनवाने के लिए पर्स टटोलने लगा था।
          अपने गंतव्य का टिकट लेने के लिए मैंने कंडक्टर को सौ का एक नोट दिया तो उसने टिकट से बचे पैसे मुझे तत्काल वापस कर दिए। मैंने कंडक्टर द्वारा लौटाए उन रुपयों को बिना गिने हुए वैसे ही अपनी जेब में रख लिया था। इसके बाद मैंने  टिकट देने के लिए कंडक्टर की ओर देखा तो वह मुँह में पान की गिलौरी लिए बेफिक्र अंदाज में अपनी सीट पर बैठने की फिराक में दिखाई पड़ा था। कुछ क्षणों बाद थोड़ी सी जगह बनाकर वह हम दोनों के बीच में आकर बैठ गया था। इसके बाद जब उसने मुझे टिकट देने में रुचि नहीं दिखाई तो मैंने सोचा, "हो सकता है कंडक्टर ने लौटाए रूपयों के साथ टिकट भी दे दिया हो" और मैंने अपने को टिकट लिया हुआ मान लिया था। खैर..
           बस चलती रही...कंडक्टर सीट पर हमारे साथ बैठने में परेशानी अनुभव कर रहा था जहाँ हम उसकी सीट पर कब्जा जमाए आराम से बैठे थे। मैंने ध्यान दिया था, कंडक्टर ने बड़ी चालाकी के साथ उन बुजुर्ग सज्जन को एक दूसरी सीट पर बैठाने के प्रयास में उठाया था। लेकिन सीट न मिलने से वे बेचारे खड़े-खड़े अपनी बाकी की यात्रा पूरी करने लगे थे, उनकी यह स्थिति देख मैं असहज हो उठा था। असल में, मेरे बैठने के पहले ही वे कंडक्टर की इस सीट पर बैठे हुए थे और उम्रदराज भी थे इस आधार पर इस सीट पर बैठने का नैतिक अधिकार उन्हीं का था। जबकि कंडक्टर ने बुजुर्ग को दूसरी सीट पर बैठाने के बहाने से उठाकर उनके प्रति अन्याय किया था और मुझसे आराम से बैठ जाने के लिए कहा था। मेरी असहजता का कारण यही था।
     
               मैंने एकबारगी कंडक्टर की ओर फिर निहारा, वह नई-नई भर्ती का लगा था, लेकिन उसका पान जैसा कुछ चबाने और बोलने का अंदाज उसे एक टिपिकल मझा हुआ सरकारी बाबू जैसा बता रहा था जो तमाम बातों की बेफिक्री में बस अपनी तईं करता हुआ मस्त दिखाई दे रहा था। उस कंडक्टर को देखकर मैं सोचने लगा था, "इस कंडक्टर ने मुझे क्यों नहीं हटाया.? मेरे भी बाल पर सफेदी ने अपना कब्जा जमाना शुरु कर दिया है...हो सकता है मेरे बालों की सफेदी मुझमें भी बुजुर्गियत झलका रही हो और समाज में बुजुर्गों का सम्मान तो होता ही है... लेकिन मैं उनके जैसा बूढ़ा तो नहीं..! और उन बुजुर्ग बेचारे ने भी कंडक्टर से अपने उठाए जाने का प्रतिकार क्यों नहीं किया?" असल में मैंने इधर अपने बालों को रंगना छोड़ सा दिया है और परिणामस्वरूप मैं अपने प्रति लोगों के व्यवहार में थोड़ा परिवर्तन भी पाया है। मतलब जैसे कोई मेरे उम्र का खयाल करते हुए मुझे विशेष तरजीह सा दे देता है। हालाँकि घर की ओर से बाल रंगने का मुझपर बराबर दबाव बना हुआ है। 
         लेकिन इधर, बुजुर्ग को कंडक्टर द्वारा उठाए जाने को लेकर वहाँ बैठे-बैठे मेरे मन ने इन प्रश्नों को ही जैसे जीवन के दुरूह प्रश्न मान लिए और  इस उत्तर पर बात जाकर खतम हुई-
         "असल में इस चलती बस के आगे सरकारी गाड़ी लगा कर मेरे ड्राइवर ने इसे रुकवाते हुए मुझे चढ़ाया था..मेरे इस सरकारीपने के ठसक के प्रभाव में मेरा लुक कुछ-कुछ वीआईपी-पने लिए जैसा हुआ हो, और मेरे इस लुकीय प्रभाव में संकोचवश बचारे वे बुजुर्ग सीट से उठाए जाने पर अपना नैतिक प्रतिरोध कंडक्टर से दर्ज न करा पाए होंगे....वाकई! ऐसे ही तमाम तरह के नैतिक अधिकार वाले प्रतिरोध ऐसे ही ठसकों के सामने संकोच खा जाते होंगे।" खैर..
         इधर मैं भी अपने ठसक रूपी मगरूरी में, नैतिक दायित्व से बेपरवाह अपने इस ठसकीय प्रभाव से अर्जित सीट रूपी काले धन पर बैठने के सुख के साथ अपने गंतव्य को प्राप्त हुआ था। 
           मैं बस से उतरा तो अचानक फिर से टिकट का ध्यान आया। मैंने जेब से कंडक्टर द्वारा लौटाए नोटों के बीच टिकट खोजने लगा लेकिन टिकट मुझे नजर नहीं आया। मतलब कंडक्टर ने बिना टिकट दिए ही मुझे यहाँ तक लाया था और मैं उस बस का एक बेटिकट यात्री था। मेरे दिए किराए के पैसे कंडक्टर की जेब में काले धन के रूप में जमा हो गए थे। उस कंडक्टर ने मुझे उन नोटों की शक्ल में तीन रूपए अधिक भी लौटाए थे। मेरे प्रति उसकी अजीब तरह की सदाशयता थी। अब जाकर कंडक्टर द्वारा सम्मान के साथ अपनी सीट पर मुझे बैठाए रहने का राज समझ में आया। लेकिन मेरे ही साथ उसने ऐसा क्यों किया यह बात मैं समझ नहीं पाया..! अब इस बात के विश्लेषण की शक्ति मुझमें नहीं बची थी। हाँ इतना जरूर है कि अब युग बदल रहा है आप किसी बात का गुमान न पालें। 
          अगले गंतव्य के लिए अब मैं एक दूसरी बस में सवार हुआ था, वह क्या है कि आजकल लगता है रोडवेज ने नई बसों की खरीदारी की है सो यहाँ से भी मुझे नई बस मिली। मुझे रोडवेज द्वारा बसों के बेडें में नई बसों को ले आना अच्छा लगा था। इस बस में मुझे सीट मिली जहाँ मेरे बगल में एक सज्जन पहले से बैठे हुए थे।  मेरे टिकट लेने के बाद उन्होंने भी कंडक्टर की ओर टिकट के लिए दो हजार का एक नोट बढ़ाया। कंडक्टर ने फुटकर न होने की बात कह कर दो हजार नोट वापस वापस कर दिया तो उस व्यक्ति ने छोटे नोट से अपना टिकट बनवाया था। मुझसे बातों-बातों में उस व्यक्ति ने नोटबंदी की प्रशंसा भी करना शुरू कर दिया था..वह कहता रहा और मैं सुनता रहा। नोटबंदी के समर्थन में उस व्यक्ति ने कालेधन का प्रवाह रोकने के लिए एक सलाह भी दिया- 
      
         "शहरों में जमीन के प्लाटिंग पर एकदम से रोक लगा देनी चाहिए। बल्कि सरकार को स्वयं आगे आकर बहुमंजिली इमारतें बनाकर लोगों को आवासीय सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए। इससे जमीन की व्यर्थ बर्बादी रुकने के साथ ही बिल्डरों की माफियागीरी पर रोक के साथ शहरी पर्यावरण में भी सुधार होगा और तमाम तरह के अवैध कब्जों साथ जमीन सम्बन्धी अन्य अपराधों पर रोक लगेगी।" 
          मैं मौन, हाँ हूँ के साथ उनकी बातें सुनता रहा। इनके चुप होते ही पास की सीट पर बैठे एक अन्य सज्जन पर ध्यान चला गया जो किसी से मोबाइल पर बात कर रहे थे, उनकी बात "उसी सामान पर बस रैपर लगा दो" पर ध्यान चला गया मुझे लगा जैसे किसी और के बनाए माल पर अपना रैपर लगाने की बात कह रहे हों। मोबाइल पर बात कर चुकने के बाद साथ में बैठे व्यक्ति से बात करते हुए विभिन्न तर्कों द्वारा नोटबंदी की जबर्दस्त तारीफ करते जा रहे थे।
         एक जगह बस रुकी तो कुछ और यात्री बस में सवार हुए, बस की सभी सीटें भर चुकी थी, एक बच्ची मेरे बगल में आकर खड़ी हो गई थी। अचानक "रैपर" लगवाने वाले सज्जन मुझसे उस बच्ची को बैठाने के लिए कहा। बच्ची के प्रति उनकी इस सदाशयता का मैं प्रतिकार नहीं कर सका और कठिनाई सहते हुए दो की अपनी सीट पर मैंने उस तीसरी बच्ची को सरकते हुए किसी तरह बैठाया था। इधर वे "रैपर" वाले सज्जन की नोटबंदी के पक्ष में एक से एक तर्कों के साथ वार्ता जारी थी। मुझे उनकी कुछ आदर्शातामक बातों को सुनकर कोफ्त सी होने लगी थी और मैं मन ही मन उनके बारे में सोच रहा था - 
          "बडे़ आए बड़ी-बड़ी बातें करने वाले एक बच्ची को तो अपनी तीन वाली सीट पर जगह नहीं दे सके...नैतिकता की बातें तो केवल बात करने भर के लिए होती हैं..इन बातों के पालन की नौबत आए तो ऐसे लोग स्वयं आगे न आकर दूसरों से अपेक्षा करते हैं..ऐसे लोगों की बातों को क्या महत्व देना...!" और यह सोचते ही नोटबंदी के पक्ष में उनकी सारी बातें मुझे हलकी प्रतीत होने लगी थी। 
            ऐसे ही कुछ देर और बीता...ड्राइवर ने अचानक बस में ब्रेक लगाई तो बस में खड़े होकर यात्रा कर रही एक अन्य महिला गिरते-गिरते बची...तभी वह "रैपर" वाला व्यक्ति अपनी सीट से उठते हुए उस महिला को अपनी सीट देते हुए बैठ जाने का अनुरोध किया। वह महिला उसकी सीट पर बैठ गई थी। उस व्यक्ति ने अपनी बाकी की यात्रा बस में खड़े होकर पूरी की थी।
         इधर मेरी मन:स्थिति विचित्र सी हो चुकी थी, अपने मन को धिक्कारते हुए मैंने इस मन को व्यर्थ के मुगालते पाल लेने से बचने के लिए सलाह दिया...मैंने मन ही मन जैसे स्वयं से कहा हो, "बेटा व्यर्थ के मुगालते मत पाला करो..अन्यथा तुम्हारी बातों का मैं भी विश्वास नहीं करुँगा..तुम्हारे निष्कर्ष मुझे धोखा देते हैं..." अब मैं मन के विचारों और इसके निकाले निष्कर्षों पर नियंत्रण करने का प्रयास करने लगा था। क्योंकि कभी-कभी मन के निष्कर्ष धोखा भी दे जाते हैं।
          हाँ, सच में! हमें व्यर्थ के मुगालते पाल किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की जल्दी नहीं करनी चाहिए...और मन को किसी बंद गली में छोड़ना भी नहीं चाहिए..मन के लिए खुला आकाश चाहिए.. वाकई! यह संसार भी अभी किसी अन्तिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाया है..! मन को मन के निष्कर्षों की मगरूरी से बचाइए..! - Vinay