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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

चाय का जायका

           आखिर ना-नुकुर करते-करते सुबह पाँच तैंतीस पर स्टेडियम की ओर निकल ही गए..सुबह, अब थोड़ी ठंड बढ़ गई है। रास्ते में पीछे कुछ लड़के किसी "लाइन"की बात करते हुए चले आ रहे है। मैं मन ही मन सोच रहा था..इधर लोग अब कुछ ज्यादा ही सभ्य हो चले हैं मतलब "तुम तो सभ्य नहीं हुए" जैसी बात अब नहीं रह गई है। मुझे याद आया बीस-पच्चीस साल पहले जैसे लाईन का कोई मतलब ही नहीं होता था। इलाहाबाद में पढा़ई के दिनों में किसी फार्म के भरने या बैंक में फीस जमा करते समय यदि लाइन लगती भी तो टूट जाती थी..खिड़की तो जैसे धुमक्खी का छत्ता सा दिखाई देता..लाइन-फाइन का कोई मतलब ही नहीं होता..तब मैं सोचा करता था, काश! कोई लाइन लगवाने वाला होता तो चाहे जित्ति देर खड़ा रहना पड़ता खड़े रहते। लेकिन तब जैसे किसी को हमारी फिकर ही नहीं हुआ करती थी..
            ऐसे ही मुझे याद आता है कि एक बार किसी बैंक की खिड़की पर मैं लाइन लगाए हुए था..वहाँ धकापेल मची हुई थी। लाइन लगती और टूट जाती। दादा टाइप के लड़के आते और खिड़की पर पहुँच अपना काम करा कर निकल लेते कोई बोलता तो उसे हड़का लेते.. यही नहीं कुछ लड़के तो धंधा भी बना लिए थे...मैं मायूस सा यह सोचते हुए खड़ा था कि काश! कोई लाइन लगवाने वाला यहाँ आ जाता...उस दिन किसी परीक्षा फीस जमा करने का अन्तिम दिन था... तभी एक पुलिस वाला मेरे पास आया और मेरी मायूसी देख द्रवित होते हुए मुझसे मेरा फार्म और फीस के पैसे लिए..दस रूपए में फीस जमा करने का सौदा तय हो गया था.. कुछ क्षणों बाद फीस जमा कर उसने रसीद मुझे सौंप दी थी...वाकई! मेरे लिए आश्चर्य जनक रहा था..तभी से मैंने लेने-देने के महत्व को सीख लिया था। 
            आज स्टेडियम की ओर जाते हुए "लाइन" शब्द सुनकर मुझे मेरे वे पुराने दिन यह सोचते हुए याद आए कि "कोई लाइन लगवाने वाला, शायद अब आ गया है..जहाँ किसी की दादागीरी नहीं चल रही है.." इन्हीं खयालों में खोए-खोए मैं स्टेडियम तक आ चुका था। वहाँ टहलते हुए टहलबाज ग्रुप वालों से शुरू में ही भेंट हो गई..उनके बीच चल रही बातों पर कान लगाया, "लाइन में लगने वाले समोसा हाथ में लेकर लाइन में लगे होते हैं..दो तीन घंटे बाद काम कर फिर से लाइन में लग लेते हैं" "वैसे लाइन लगाने से जनता परेशान नहीं है..इसके बाद भी नोटबंदी की प्रशंसा कर रही है.. हाँ परेशानी तब होती है जब दो-तीन घंटे लाइन में लगने के बाद काउंटर पर यह कह दिया जाता है कि कैश खतम हो गया है" "आइ बी ने रिपोर्ट भेजा है कि ये नेता दंगे करवा सकते हैं....आखिर नोटबंदी से इन्हीं नेता का ही सबसे अधिक नुकसान हुआ है..." "अब समस्या उतनी नहीं रह गई है यदि इन मजदूरों का चक्कर न हो तो..नोट बदलवाने का इन्हें अच्छा-खासा काम मिल गया है" "अभी बैंक में स्याही नहीं पहुँची है..मार्कर तो लगा रहे हैं लेकिन मजदूर इसे मिटा कर फिर लाइन लगा लेते हैं" यही जुमले आज मैंने सुने। असल में इनके पास से गुजरते हुए मैंने अपनी चाल थोड़ी धीमी कर ली थी। इसीलिए इतने जुमले सुन पाए। खैर....
            स्टेडियम का दो चक्कर लगाया और वापस लौट चला। रास्ते में बीच सड़क पर एक गाय अपने बछड़े को दूध पिलाती हुई दिखी। बछड़ा उझक-उझक कर थन से दूध पी रहा था। गाय बेचारी अपने बछड़े की ममता में उसका उझकना सहते हुए पगुराते हुए उसे भरपेट दूध पी लेने का अवसर दिए जा रही थी। वाकई! एक माँ अपने बच्चे से अपने ममत्व के बदले कोई स्वार्थ नहीं रखती। यह दृश्य मुझे कभी का किसी राजनीतिक दल का चुनाव-चिह्न जैसा भी लगा। लेकिन सुबह-सुबह ममत्व के इस दर्शन ने हृदय को एक ताजगी भरे अहसास से भी भर दिया। इस गाय के पीछे सड़क की पटरी पर नोटबंदी की चिन्ता से मुक्त एक कुत्ता अपनी एक टाँग से गर्दन खुजला रहा था। यह सब देखते मैं आगे बढ़ गया था। 
            मुख्य सड़क पर आते ही मैंने सात-आठ कुत्तों को भौंकते हुए एक ही तरफ भागते हुए देखा, जैसे ये भी किसी नोटबंदी से परेशान होकर कोई ज्ञापन देने हेतु मार्च कर रहे हों..यह सब देखते-सुनते मैं अपने आवासीय परिसर में लौट आया। 
               वैसे मैं चाय कड़क नहीं पीता, बचपन में दादा जी कड़क चाय पीते थे बस उन्हीं के साथ कड़क चाय पीने की आदत थी। लेकिन इलाहाबाद की उस लाइन से अपने चाय का जायका मैंने बदल लिया था। हाँ, अब चाय में अदरक-वदरक मिलाकर अपनी चाय को जरूर स्वादिष्ट बना लेता हूँ...ऐसे ही आज भी स्वयं की बनाई हुई चाय मैंने पिया। 
        फिर अखबार पढ़ा.."सुषमा की किडनी फेल, जल्द होगा प्रत्यारोपण" पढ़ते हुए ईश्वर से दुआ मांगी कि भगवान इन्हें शीघ्र स्वस्थ करें। बाकी खबरें राजनीतिक टाइप की थी। उसकी चर्चा आवश्यक नहीं। 
              #दिनचर्या टाइप 
               17/11/16 
                --Vinay