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मंगलवार, 18 मार्च 2014

आप किस कैटेगरी में हैं....!

                आज वह टी वी पर नए-नए बने  मंत्रिमंडल का शपथ-ग्रहण समारोह देख रहा था। साथ में ही उसके एक पुराने मित्र...जो उसके बालसखा थे.. बैठे थे। अभी-अभी जो मंत्री शपथ लेकर गया है; उसने 'ईश्वर' की शपथ लेकर कर्तव्य निर्वहन की बात कही। वहीँ दूसरे ने 'सतयनिष्ठा' की शपथ ली।
              इसी बीच साथ बैठे  मित्र ने पूँछा ,
             "अरे तुम क्या देख रहे हो"
             "मंत्रियों का शपथ-ग्रहण समारोह " उसने कहा। 
             "अरे ; वह तो मैं भी देख रहा हूँ" मित्र ने उसकी ओर देखते हुए कहा। 
             "लेकिन इसमें तुमने कोई खास बात देखी ?" उसने मित्र की ओर जैसे प्रश्नवाचक निगाहों से देखा। 
             "यार ऐसे बोल रहे हो जैसे इस शपथ-ग्रहण में भी कोई रहस्य हो... अरे जिसको मन्त्री बनाना था बना दिया गया आगे जो असंतुष्ट होंगे सरकार फिर विस्तार करेगी।" मित्र महोदय ने कहते हुए रहस्य भरी निगाहों से उसकी ओर देखा।
           "अच्छा ये बताओ क्या तुमने इस पर ध्यान दिया ! कुछ मंत्री 'ईश्वर' का तो कुछ ने 'सत्यनिष्ठा' की शपथ ली है।" यह कहते हुए उसने मित्र की  ओर  मुस्कुराते हुए देखा।
            "हाँ यार सुना तो मैंने भी इसे....लेकिन इसमें कौन सी खास बात...?" अब मित्र ने जिज्ञासा पूर्वक उसकी ओर निहारा।
            "क्या तुम 'ईश्वर' और ' सत्यनिष्ठा' जैसे शब्दों के प्रयोग के अंतर को समझ रहे हो।" जैसे वह मित्र को कुछ समझाना चाहता हो।
             "अरे भाई आप हमे इतना नासमझ मानते हो.... ?"  मित्र ने थोड़ी झल्लाहट में कहा। आगे फिर जोड़ा,
             "ईश्वर' की शपथ लेने वाला आस्तिक या कहें ईश्वरवादी है और 'सत्यनिष्ठा' कि शपथ लेने वाला एक तरह से कहें तो नास्तिक या फिर मूर्तिपूजा में विश्वास न रखता हो...!" कहते हुए मित्र महोदय ने उसकी ओर देखा ..और आचानक जैसे उन्हें कुछ सूझा लगभग उछलते हुए से फिर बोले,
              "अच्छा... इसमें नेताओं की भी राजनीति हो सकती है...! कुछ अपने को सेकुलर दिखाना चाह रहे हों इसीलिए 'ईश्वर' के स्थान पर 'सत्यनिष्ठ' की शपथ ले रहे हैं..!" मित्र महोदय ने संतोष भरी निगाहों से उसे देखा।
              लेकिन अब भी वह शांत था जैसे मित्र के उत्तर का उस पर कोई प्रभाव न पड़ा हो... मित्र ने अपने उत्तर का कोई प्रभाव उस पर न पड़ता देख पूँछ ही बैठे,
               "अच्छा तुम्हीं कोई अपनी थीसिस बताओ..."
              "देखो भाई जो मै बताना चाहता हूँ यह मेरी अपनी मान्यता है...तुम्हें इसे मानने या न मानने की स्वतंत्रता है..." उसने कहा।
               "हाँ-हाँ...अपनी ही मान्यता बताओ तुम...." मित्र ने छूटते ही कहा।
               "मेरे हिसाब से, लगता है कि जो 'सत्यनिष्ठ' की शपथ ले रहा है वह अपने कर्तव्य-निर्वहन के प्रति अधिक उत्तरदायी और संवेदनशील है...और जो 'ईश्वर' कि शपथ ले रहा है उसके बारे में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता कि वह सौंपे गए दायितों का निर्वहन किस तरह से करेगा...हाँ प्रतीत होता है कि वह अपने लिए सभी विकल्पों को खुला रखना चाहता है..." मुस्कुराते हुए उसने एक साँस में कहा।
                "क्या मतलब...? ईश्वर से भी बढ़ कर भी कोई चीज हो सकती है..? और फिर ईश्वर और सत्य में भेद क्या..?" मित्र ने कहा।
               "भई देखो मेरा दृष्टिकोण तो यही है कि इसमें अंतर है..." उसने मित्र से दृढ़तापूर्वक कहा।
                "वह कैसे.." मित्र ने जिज्ञासु बच्चे कि तरह पूंछा।
                "देखो तुम कहते हो न कि इश्वर सर्वत्र है और सब कुछ ईश्वर में है...या समस्त ब्रह्मांड ईश्वर का ही स्वरुप है... "  उसने कहा।
                "हाँ..हाँ.. ईश्वर मानने की अवधारणा में ही यह निहित है कि भगवान् अनंत और व्यापक है अर्थात सब कुछ ईश्वर में है और ईश्वर सब कुछ है..."  जैसे मित्र ने ईश्वर नामक जीव कि व्याख्या की हो|
                 "हाँ यही तो मैं भी कहना चाहता था.." वह धीरे से मुस्कुराया।
                 "तो फिर इसमें कौन सी बात हुई..." मित्र ने पूंछा।
                 "बात है....जानते हो..! 'सत्य' केवल सत्य होता है..असत्य कभी नहीं....या तो कोई चीज सत्य होगी या फिर असत्य...दोनों एक साथ नहीं हो सकती....जबकि ईश्वर में सत्य और असत्य दोनों विद्यमान है...!"
                    फिर उसने कहा...,
                 "अर्थात...'सत्य' में सत्य के सिवा और  कोई विकल्प नहीं होता जबकि ईश्वर तो अनंत विकल्पों का मार्ग है..."
                 "ओह...! तो तुम्हारी सोच यहाँ पहुँच गयी..." मित्र ने आश्चर्यमिश्रित अंदाज में कहा|
                 "यही कारण है भइये..! शपथ लेने वाले मंत्रियों के मनोविज्ञान को समझ रहा हूँ..! सत्यनिष्ठा कि शपथ लेने वाले अपने लिए अन्य विकल्पों का रास्ता बंद कर दे रहे हैं; जबकि ईश्वर कि शपथ लेने वाले अपने लिए अनंत विकल्पों का मार्ग खुला रखना चाहते हैं..." इतना कहते हुए उसकी मुस्कुराहट हंसी में बदलने लगी।
                  "अच्छा..! मेरी समझ में अब आया कि क्यों तुमने उनके कर्तव्य निर्वहन के बारे में अलग-अलग दृष्टिकोण रखे.." आगे मित्र ने फिर जोड़ा, "ईश्वर तो अनंत विकल्पों का मार्ग है.. वाह क्या परिभाषा गढ़ी है तुमने...!" अब मैं चुप था।
                   मित्र महोदय ने आगे फिर जोड़ा,
               "हाँ भाई इस आधार पर ईश्वर की शपथ लेने वाले की गलतियों को तो मैं माफ़ कर सकता हूँ क्योंकि वह तो अनंत विकल्पों का मार्ग लेकर मन्त्री पद ग्रहण कर रहा है... लेकिन सत्यनिष्ठा की शपथ लेने वालों को मैं माफ़ नहीं कर सकता क्योंकि फिर वे निरे ढोंगी होंगे..." अब मित्र महोदय के हँसने की बारी थी...
                     उसने डरते-डरते मित्र महोदय से धीरे से पूँछा...,
                "फिर... आप...किस कैटेगरी में हैं...." और दोनों एक साथ खिलखिलाकर हँस पड़े।
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