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सोमवार, 17 मार्च 2014

"सदा आनंद रहई यह द्वारे मोहना..., मोहन खेलई फागलाल मन मोहना..."

                                                                                  ...स्मृति शेष 
              आज होली है...! पर..., पता नहीं क्यों.. मन होली से बहुत दूर है... बचपन से लेकर कई सालों पूर्व तक गाँव में मनाई गयी होली पर ध्यान अटक जाता है....हाँ..,वह कैसी निश्चिन्तता भरी होली होती थी...! महीनों से चलने वाले "फगुआ गीत" का आज के दिन जैसे उत्साह भरे हुडदंग के साथ दरवाजे-दरवाजे
घूम-घूम कर यह गाते हुए..."सदा आनंद रहई यंह द्वारे मोहना..मोहन खेलई...," उसका समापन होता था...! ढोलक कि तेज होती थापों के बीच पड़ती रंगों कि बौछारें..! हाँ..इसी बीच पता चलता कि मामा (हाँ हम बच्चे उन्हें मामा ही कहते थे) को कुछ लोगों ने हाथ और पैर से पकड़ लगभग झुलाते हुए कीचड़ में फेंक दिया है...! बड़े-छोटे का भेद मिट जाता...बिना राग-द्वेष का यह जीवनोत्सव मन को एक नए उमंग से भर देता...जो आगामी वर्ष तक जीने की उर्जा देता रहता...
          लेकिन पता चल रहा है गाँव में भी वह उत्साह नहीं रह गया है...होलिका-दहन के लिए गाँव सभा की सुरक्षित सी वह जमीन भी कब्ज़ा कर के बेंच दी गयी है..आज वहां बड़ी सी बाउंड्रीवाल खड़ी कर दी गयी है...! समूह में खड़े होने की जगह तक नहीं बची है... और तो और...प्रधानी के चुनाव ने भी तो गाँववासियों के बीच बड़ा वैमनस्य फैला दिया है...! कैसे उनके साथ खड़े हो...! कहीं हमें उस पार्टी का और कहीं इस पार्टी का न समझ लिया जाए...अरे..! ...उसने तो हमारी ही जमीन को तहसील में तीन-पांच कर अपने नाम करा के कब्ज़ा कर लिया है...और... वह इतना बड़ा आदमी कैसे बन गया है...! ..मैं उसके साथ क्यों खड़ा होऊँ.....! बड़े-छोटे के बीच कि खांई का गहरा होता अहसास....! आदि-आदि जैसे प्रश्न शायद लोगों को मथ रहे हैं...! तभी तो गाँव कि होली अब सूनी सी हो गयी है...! शायद हमारे गावों कि अब यही कहानी हो चुकी है.....
          हाँ...अब हम अकेले ही अपने हिस्से की होली मना रहे हैं...अपने-अपने हिस्से की इस होली के लिए सभी को यह कहते हुए हार्दिक बधाई..."सदा अनंद रहई यंह द्वारे मोहना..., मोहन खेलई फाग लाल मन मोहना...."