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रविवार, 8 जुलाई 2012

सत्यमेव जयते


          आमिर खान के शो ’सत्यमेव जयते’ में आज जातिवाद, छुआछूत आधारित सामाजिक भेदभाव जैसी कुप्रथा को मुद्दा बनाया गया। इसे देखकर कुछ यादें ताजा हो गयी! बचपन में कपड़े सीने का काम करने वाला एक आदमी अकसर हमारे घर आया करता था। वह घर से कपड़े लेकर उन्हें सिलकर फिर घर पहुँचा दिया करता था। एक बार हमारे घर पर किसी की तेरहवीं पर भोज का कार्यक्रम था उसे भी निमंत्रित किया गया था। खाना खाने वाले लोगों की पंक्ति के बीच में बैठकर वह भी भोजन कर रहा था। उसे इस तरह लोगों के बीच पाँत में बैठकर खाना खाते हुए देखकर घर के ही एक सदस्य ने कुछ बडबडाते हुए उसकी ओर इशारा किया और फिर मैनें उन्हें उस व्यक्ति को खाने वाले लोंगों की पाँत से उठाते देखा। वह उस बेचारे को सबसे अलग बैठ कर खाने के लिए कह रहे थे क्योंकि वह तथाकथित एक दलित जाति से था। लेकिन तब उस व्यक्ति ने अपने को बहुत अपमानित महसूस किया था। फिर उसने खाना नहीं खाया और वह उठकर चला गया था। आज भी वह घटना मुझे बरबस याद आती रहती है अपमान बोध से पीड़ित वह फिर कभी हमारे घर दिखाई नहीं दिया।

       इसी तरह स्कूली दिनों का मेरा एक अन्य अनुभव रहा है। मैं इंटर प्रथम का छात्र था उन दिनों कभी-कभी मैं अपने स्कूटर से कालेज चला जाता था। मेरे गाँव का ही मेरा एक सहपाठी भी मेरे साथ मेरी ही कक्षा में पढ़ता था। अकसर मैं अपने उस सहपाठी मित्र के भी स्कूटर पर बैठाकर कालेज चला जाता था। उसे इस तरह हमारे साथ स्कूटर पर बैठ आते-जाते देख हमारी कक्षा के तथाकथित ऊँची जाति के छात्र मेरी खिल्ली उड़ाया करते थे कि मै एक दलित जाति के छात्र को अपने स्कूटर पर क्यों बैठाता हूँ।

               उक्त बातें तो मेरे अपने अनुभव का विषय रहा है लेकिन मेरे एक परिचित ने बातों-बातों में ही अपनी एक ऐसी पीड़ा को मुझसे व्यक्त किया जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को सोचने पर विवश कर सकता है। वह सरकारी सेवा में हैं तथा उन्होंने बताया कि कैसे अनुसूचितजाति वर्ग में पैदा होने के कारण उनके बच्चों कि पढ़ाई बाधित हुई थी! 
            पहले उनके बच्चे गाँव में पढ़ते थे। जब वे सरकारी नौकरी में आए तो वह बच्चों को शहर में पढाना चाहते थे, लेकिन शहर में उन्हें किराए का घर इसलिए नहीं मिल पाया था कि वह एक दलित जाति से थे। कोई उन्हें किराये पर अपना घर देने के लिए तैयार नहीं होता था। इस कारण से उनके बच्चों की स्कूली शिक्षा तीन वर्ष पीछे हो गई थी। 

            वास्तव में जातिगत भेदभाव के मनोरोग को हम आज भी देख एवं सुन सकते हैं, शहरों में हो सकता है यह कुछ कम दिखाई दे लेकिन गाँवों में यह अपने उसी वीभत्स रूपों में आज भी है जैसा कि आमिर ने अपने शो में दिखाया। हम दलितों की इस पीड़ा को दलित हो कर ही अनुभव कर सकते हैं इस समाज के प्रति उनके विद्रोह के स्वर बेहद जायज हैं। और जब तक शेष समाज भी इस पीड़ा को उसी शिद्दत से अनुभव नहीं करता यह मनोरोग समाप्त होने वाला नहीं है। आमिर को साधुवाद !

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