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सोमवार, 23 अप्रैल 2012

कबीर वाणी


          आज कल अन्ना हजारे, स्वामी रामदेव तथा उनके सहयोगियों द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध चलाये जा रहे आन्दोलनों का आम जनमानस पर क्या प्रभाव पड़ रहा है स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। कभी कभी तो यह आंदोलन टेलीविजन के लिए प्रायोजित लगते हैं तथा मात्र सरकार के विरोध में चलाये गए प्रतीत होते हैंइसके साथ ही यह आम लोगों को स्वयं भ्रष्ट आचरण से दूर रहने के लिए प्रेरित नहीं कर पा रहा है, ऐसी स्थिति में मात्र सरकार को उत्तरदायी ठहराकर किसी कानून के बनने से भ्रष्टाचार दूर नहीं हो सकता। यह उसी तरह की गतिविधि बनती जा रही है जैसे आजकल के धार्मिक प्रवचन देने वालों का प्रवचन। यह प्रवचन टेलीविजन पर तथा जगह-जगह शिविरों में बड़े-बड़े नामों द्वारा देते हुए देखा जा सकता है लेकिन इसका लोगों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है यह चिंतन का विषय है। ऐसा प्रतीत होता इन्हें देखना या सुनना केवल फैशन बन चुका है आत्मसुधार का कोई लक्षण नहीं। वास्तव में यहीं पर कबीर की यह वाणी प्रासंगिक है विना इसके उपरोक्त सन्दर्भों में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता-

            कबिरा खड़ा बाजार में, लिए लुआठा हाँथ,
          जो घर जारै  आपनो, चलै हमारे  साथ। 

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