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शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

लिखने योग्य अच्छा काम...!!


         सुबह का वक्त था..., ट्रेन प्लेटफार्म से धीरे-धीरे खिसक रही थी...दौड़ कर किसी तरह चढ़ पाया..., बैठने के लिए सीट तलाश करने लगा...नीचे की एक बर्थ पर खाली जगह दिखाई दी...वहां बैठना चाहा...पास में ही बैठा एक व्यक्ति बोला,
                   “नहीं-नहीं, यहाँ मत बैठो मेरी बर्थ है...|”
मैंने वहां बैठने का निर्णय बदल लिया...ट्रेन के गलियारे में, आते-जाते लोगों के धक्के खाते खड़ा रहा...तभी दूसरे बर्थ पर बैठे एक व्यक्ति को उसी बर्थ पर आराम से बैठा एक आदमी यह कहते हुए उठा रहा था,
        “अरे यहाँ से उठो, यह हमारी रिजर्व बर्थ है...”
लेकिन दूसरा उठने से रहा... बोला,
        “मैं अब बैठ गया हूँ नहीं उठूँगा..मैं रोज चलता हूँ|”
उठाने वाला भी थक-हार कर चुप हो गया...| ट्रेन अपनी पूरी गति पकड़ चुकी थी...इधर मैं भी गलियारे में खड़े-खड़े लोगों के धक्के खाते ऊब गया था...अब ऊपर के खाली बर्थ पर बैठना चाहा...जैसे ही मैंने ऊपर बैठने का प्रयास किया नीचे आराम से बैठे व्यक्ति ने टोक दिया,
       “अरे भाई इतना परेशान होकर तो हम लोग रिजर्वेशन करा पाते हैं, आप लोग इस बात को समझते नहीं...पिछली बार तो वेटिंग ही कन्फर्म नहीं हो पाई तो हम लोग गैलरी में ही लेट और बैठ कर गए थे...|”
उसने फिर कहा,
                “वहां न बैठो, मैं लेटने जा रहा हूँ...|”
मैंने उसकी बात सुनी, उससे बहस नहीं करना चाहता था फिर भी झुंझलाकर बोल उठा,
                  “समझता हूँ...|
खैर बैठने के इस प्रयास को भी मैंने छोड़ दिया और सोचने लगा...
        ...ये रेल वाले भी अजीब व्यवस्था बनाते हैं...बैठने तक की कोई ठीक व्यवस्था देते नहीं...हाँ, लेटने की पहले कर देते हैं...कहने को जनरल बोगी लगी है...लेकिन वहां भी तिल रखने की जगह नहीं होगी...शौचालय में लोग घुस कर बैठे होंगे...जनसँख्या या व्यवस्था, पता नहीं कौन जिम्मेदार है...सोचते-सोचते सीट की तलाश में दूसरे कूपे में आ गया...अचानक एक बर्थ पर खाली जगह दिखाई दी, उल्लसित हो वहां मैं बैठ गया...यहाँ भी पास ही बैठे एक व्यक्ति के सज्जनतापूर्ण प्रतिरोध का सामना करना पड़ा...फिर भी मैं ही सफल हुआ| गाड़ी कहीं रुकी थी...चल पड़ी...एक टीटी आता हुआ दिखाई दिया, मैं थोडा नर्वश सा हुआ क्योंकि टिकट तो जनरल क्लास का लिए था और बैठा स्लीपर बोगी में..., टीटीई पास बैठे व्यक्ति से उलझ गया शायद वह भी मेरे ही जैसा इस बोगी के लिए अनधिकृत था, दोनों में थोड़ी बहस होने लगी, मैं उनके बीच के वार्तालाप को ध्यान से सुनने लगा, टीटीई कह रहा था,
         “टिकट दिखाओ..|
उसके टिकट दिखाने पर टीटीई ने कहा,
         “इस बोगी में क्यों बैठ गए...यह टिकट तो जनरल क्लास का है...|” 
         “क्या करते जनरल डिब्बे में बहुत भीड़ है खड़े होने तक की जगह नहीं है” यात्री ने कहा|
         “लेकिन पेनाल्टी देनी पड़ेगीया अभी यहाँ से हटो...”
टीटीई ने थोडा हडकाते हुए से कहा| ट्रेन भागी जा रही थी..उतरना संभव नहीं था, यात्री ने पूंछा,
         “कितनी पेनाल्टी...”
इस पर टीटीई ने कोई धनराशि बताई, लेकिन यात्री उसे देने में अपनी असमर्थता जताते हुए कहा,
         “मेरे पास इतना पैसा नहीं है…|”  
इसके बाद टीटी उस व्यक्ति को थोडा अलग ले गया, वहां से वापस आकर वह यात्री मुस्कराते हुए पुन: अपनी सीट पर बैठ गया...| मुझे अपने एक मित्र की रेल यात्रा के बारे में कही एक बात याद आ गई...उन्होंने बताया था,
         “जेब में पैसा हो तो टिकट लिए हैं या नहीं या फिर किस बोगी में बैठे है इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए, आपकी यात्रा सकुशल सम्पन्न हो जाएगी|”
अब मेरी बारी थी...लेकिन यह क्या...! टीटी ने एक बार मुझे देखा और आगे बढ़ गया...शायद मुझे डेली पेसेंजर समझ कर नजरंदाज कर दिया हो...जो भी हो मैंने राहत की सांस ली| तभी बैठे-बैठे मेरी नजर सामने लगे एक छोटे से पोस्टर पर पड़ी... हाँ...,वह पोस्टर किसी सामाजिक संस्था का था...उस पर लिखा था-
         “अच्छा लिखने से बेहतर है कि लिखने योग्य अच्छा काम किया जाय|
मैं इस पर चिंतन-मनन करने लगा...|
        ट्रेन पुन: अपनी पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी...अचानक मेरी दृष्टि ट्रेन के गलियारे में झाड़ू लगाती एक औरत पर पड़ी...वह कृशकाय, चीथड़ों में लिपटी थी...लगभग डेढ़ साल की बच्ची को कांख में दबाए झाड़ू लगाते हुए धीरे-धीरे मेरी ओर चली आ रही थी....उसकी बच्ची को देख...मैं सोचने लगा...इस बच्ची का पिता कौन होगा...कोई अपनी पत्नी और बच्चे को इस हालात में छोड़ सकता है..! या फिर इसकी माँ किसी वहशी दरिन्दे का शिकार हुई होगी...इस अभागी बच्ची का भविष्य क्या होगा...! तब तक उस औरत का हाथ मेरी ओर बढ़ चुका था... शायद उसने अपना काम पूरा कर लिया था...मैंने उसके हाथ पर एक सिक्का रख दिया...वह आगे बढ़ चुकी थी...मैंने पुन: उस छोटे से पोस्टर की ओर देखा, दृष्टि इस वाक्य पर रुक गई, “लिखने योग्य अच्छा काम किया जाय,” मैं फिर अपनी विचारमग्नता में खो गया...पता नहीं...लिखने योग्य अच्छा काम कौन कर रहा है...यह पोस्टर..! या झाड़ू लगाती कांख में बच्ची दबाए कृशकाय यह औरत...! या लिखने के लिए मसाला तलाश रहा मैं...! या फिर टीटीई समेत हम सब को ढोती बेचारी यह ट्रेन...! और मैं...अपने इन विचारों में मगन हो गया...लेकिन...वह औरत..! वह तो...बच्ची को कांख में दबाये लोगो के सामने हाथ फैलाती आगे बढ़ी जा रही थी...|
           इस बात की चर्चा मैंने जब अपनी पत्नी से किया तो उन्होंने कहा,
           “अरे ! वह इन पैसों से जाकर समोसा खा लेगी या फिर कोई उससे भींख मगवा रहा होगा...इन सबके पीछे माफिया लोग रहते हैं..! नहीं तो इतनी सारी व्यवस्था होते हुए भी वह यह सब क्यों झेल रही है,”
पत्नी ने आगे फिर जोड़ा,
           “समय बिताने के लिए आपके पास अच्छा काम है...बस लिखने बैठ जाओ...! अगर समाजसेवा का इतना ही शौक है तो ऐसे लोगों के लिए शेल्टर होम खोलो...या फिर उन परिस्थितियों, माफियाओं से भिड़ो जिसके कारण उसके लिए यह हालात पैदा हुआ..|”
पत्नी ने ये सारी बातें एक सांस में कह डाली...मैं अपनी हदें जानता हूँ...मैंने सोचा...बस अब चुप हो जाना ही अच्छा है और मन ही मन ही..ही..करने लगा...|
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शनिवार, 10 नवंबर 2012

भोगा हुआ


      ...कभी-कभी प्रतीत होता है कि जीवन में सिर्फ भोगा जाता है, अनुभव किया जाता है लेकिन क्या इस प्रकृया में कोई मानक तय किया जा सकता है...! क्या स्वयं को इस पर कसा जा सकता है...! और क्या किसी अन्य के लिए भी इसे मानक के रूप में स्वीकार किया जा सकता है...? प्रत्येक व्यक्ति का भोगा हुआ उसका अपना निजी होता है, इससे उसके अपने दृष्टिकोंण विकसित होते हैं...व्यक्ति अपने भोगे हुए से ही अपने लिए उत्तर खोजता है...हमारे भोगने का स्तर हमारे अनुभव की व्यापकता पर निर्भर करता है, जो मानस पटल पर तमाम प्रश्न उकेरते हैं...यह हमारे व्यवहार को प्रभावित करता है...इन्हीं बातों कि चर्चा अपनी पत्नी से कर रहा था, तभी पत्नी बोली, “इन बातों पर इतना दिमाग खपाना व्यर्थ है, हाँ मनुष्य का व्यवहार किन्हीं बातों से प्रभावित हो सकता है इस पर ज्यादा विचार करना और इस आधार पर निष्कर्ष निकालना सनकपूर्ण सोच है|” लेकिन वह जानता आया है...,और पत्नी को समझाने सा लगा...कभी-कभी सर्वजन के भोगे हुए से सर्वमान्य नियम खोजने का प्रयास किया जाता है, इससे वैचारिक संघर्ष का भी जन्म होता है...इस वैचारिक संघर्ष से उपजे निष्कर्ष से ही मनुष्य का मानसिक, नैतिक और बौद्धिक विकास हुआ है, इसका उसके सामाजिक जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा है...यदि ऐसा नहीं होता तो मनुष्य इतना चेतन न होता और जीवन की तमाम कलाएँ केवल सनक या पागलपन होती...और लिखना...शायद केवल सनक मात्र...!
     वैसे मनुष्य के मानस पटल पर कुछ बातें, घटनाएँ अंकित होती जाती हैं, जो उसे संवेदनशील बनाती है...शायद चिंतन की प्रकृया भी उसी से आरम्भ होती है...वैचारिक प्रश्नशंकुलता इसी संवेदनशीलता का परिणाम है...और यह प्रश्नशंकुल मनःस्थिति, उत्तर पाने की आकुलता में, तमाम सृजनात्मक कार्य कर डालता है...साहित्य, दर्शन, विज्ञान एवं अन्य कलाओं का विकास इसी का परिणाम है...
      वह अकसर ऐसे ही कुछ न कुछ सोचता रहता है..., उसे लगता है...यह आदत उसमें बेचारगी का भाव पैदा करती है...जो उसे लोगों की निगाहों में दुखी दिखाने लगता है.....लेकिन क्या वास्तव में वह दुखी है.....उसमें बेचारगी का भाव है...? ...हालाँकि वह जनता है कि ऐसा वह नहीं है... किसी का उसके लिए यह लिखना, “जो भी प्यार से मिला तुम उसी के हो लिए” शायद उसमें उस वैचारिक प्रवाह की ओर संकेत करती हो जिसमें प्रवाहित हो वह कुछ तलाशता रहता है और इस तलाश में वह सभी चीजों को स्वीकार करता जाता है...
      लेकिन फिर भी वह स्वयं को असामाजिक सा पाता है..., सामाजिकता के ताने-बानें में उसने व्यवहारवाद का ऐसा उलझाव देखा है, जहाँ वह सदैव अपने को अनफिट पाता रहा है.... जब भी वह अपने को इसमें ढालने का प्रयास करता है उसे महसूस होता है... जैसे अपने को झुठला रहा है...कुछ अस्वाभाविक सा हो रहा है...एक छद्म आवरण के खोल में घुस रहा है....उसका व्यक्तित्व खंडित हो रहा है....इस खंडितत्व का अहसास ही उसमें अपराधबोध जगाकर उसे निरीह बना देता है....जो उदासी और बेचारगी का भाव उत्पन्न कर उसे आत्मपीड़क बना देता है....इस आत्मक्षरित व्यवस्था में जीने की विवशता ही उसे कभी-कभी दुःख और उदासी के मनोभाव में ढकेल देता है...और इसकी शुरुआत कहाँ से हुई वह सोचने लगा...

सोमवार, 29 अक्तूबर 2012

पचड़ेबाज


                      सुबह हो गई थी...मैं अहाते में टहल रहा था, मेरी निगाह गुलमोहर के ऊँचे पेड़ पर गई...उसकी डालियाँ बहुत खूबसूरत ढंग से फैली हुई थी...उसके नीचे मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था...मानों वह गुलमोहर का पेड़, एक माँ की तरह अपने बच्चे को धूप या बारिश से बचाने के लिए अपने आँचल की छाया कर रखी हो...उसकी डालियों पर, पत्तियों के बीच, तोते के ही समान लेकिन उससे छोटे आकार के पक्षी उछल कूद कर रहे थे...पंखों का रंग तो हरा था लेकिन सिर पूरा लाल...देखने में सुंदर...! अपलक निहारता रहा...! तन्द्रा टूटी... जब एक गिलहरी बड़ी तेजी के साथ तने से होते हुए उन डालियों तक पहुँच गई जहाँ वे सुंदर पक्षी आपस में कलरव करते हुए इस डाल से उस डाल पर उछल-कूद कर रहे थे...तभी मिश्रा की आवाज कानों में पड़ी, “सर, चाय तैयार हो गई है.” मैंने कहा, “अच्छा पिया जाए.” तब तक मेहीलाल चाय का कप लेकर मेरे सामने हाजिर था. मैंने पूँछा, “ मेहीलाल, अख़बार आया...” “अभी नहीं” उसने उत्तर दिया. मैंने कहा, “ये तो बड़ा देर कर देता है अख़बारवाला, सात से ऊपर हो गया लेकिन अभी तक अख़बार नहीं दिया.” मेहीलाल बोला, “कल से दूसरेवाले को कह देते हैं जो थोड़ा जल्दी आता है.” तभी मिश्रा ने कहा, “सर अखबार आ गया.”
     चाय पीने के साथ मैं अखबार पढ़ने में मशगूल हो गया. सहसा मेरी नजर खबर के एक शीर्षक पर ठहर गई...कार दुर्घटना में तीन लोग मारे गए....आगे लिखा था...समय रहते यदि दुर्घटना में घायल एक व्यक्ति को अस्पताल पहुँचाया जाता तो उसकी जान बचाई जा सकती थी...खबर मुझे अंदर तक झकझोर गई...फिर..एक दिन पहले की वह घटना याद आई, शायद उसी के सम्बंध में यह खबर थी...
     शाम का धुंधलका था...मैं अपने एक मित्र के साथ, जो स्वयं कार चला रहे थे...समय से अपने गंतव्य पर पहुँच जाएँ...हाईवे पर कार भगाए जा रहे थे...सामने से आ रहे वाहनों की हेडलाईट से आँखे चौंधिया रहीं थी...तभी एक हल्की सी ब्रेक लगाते हुए सामने दिख रहे ट्रक के बारे में मित्र ने कहा, “देखा...! इसने पीछे इंडिकेटर भी नहीं जला रखा है.., सम्बंधित अधिकारी भी न जाने कैसे ऐसे वाहन को चलने के लिए परमिट करते हैं...कोई देखता भी नहीं..” मैंने सहमति जताते हुए कहा. “हाँ...सभी अपने चक्कर में रहते हैं...कौन पचड़े में पड़े.”  हम लोग फिर चुप हो गए...कार भागी जा रही थी...अचानक..! दूर सड़क के किनारे कुछ हलचल सी दिखाई दी...पास जाने पर देखा...एक कार दुर्घटनाग्रस्त हो सड़क के किनारे पड़ी थी...तीन व्यक्ति उसमें फंसे हुए थे...इसे देख हमलोग अपनी कार रोक दिए...वहाँ तब तक चार पांच व्यक्ति और पहुँच चुके थे...हम लोग अपनी कार के शीशे नीचे करते हुए पास ही खड़े व्यक्ति से दुर्घटनाग्रस्त कार में फंसे व्यक्तियों के बारे में जानकारी चाही तो पता चला कि तीनों की मौत हो चुकी है, हम लोगों को समय से पहुंचना था...फिर तुरंत चल दिए...
     अख़बार की खबर से लगा...जब हम लोग उस अभागी कार के पास पहुंचे थे तो कोई उसमें से जीवित था, बेहोश होने से लोगों ने उसे मृत समझ लिया था. उसी को यदि समय पर चिकित्सीय मदद मिलती तो वह बच सकता था...कौन पचड़ेबाजी में पड़े...यही सोचकर तो हम लोग वहाँ से निकल लिए थे...खबर पढ़ने के बाद स्वयं को अपराधी महसूस करने लगा...फिर बचपन में हुए एक हादसे की स्मृतियों में खो गया...
       उस समय आठ-दस वर्ष के बीच मेरी उम्र रही होगी...मेरे घर के पास एक तालाब था...वह तालाब तो अब भी है लेकिन बचपन में देखे गए से भिन्न...क्योंकि न तो अब उसमे कुमुदिनी खिलती हैं और न तो उसमे कोई नहाने जाता है...उस तालाब में जलकुम्भी का साम्राज्य ऐसा फ़ैल चुका है कि पानी कहीं दिखता ही नहीं, कोई कह रहा था कि किसी ने उस तालाब में जलकुम्भी इसलिए डाल दिया कि धीरे-धीरे तालाब पट जाए और उसकी भूमि पर कब्जा कर लिया जाए...यही नहीं अब तो उसका आकार भी बदल गया है….गाँव के कुछ लोगों द्वारा भू अभिलेखों में परिवर्तन कराते हुए उसे पाटना प्रारंभ कर चुके हैं. नरेगा में उस तालाब की खुदाई की ऐसी योजना बनाई गई कि उस बड़े से तालाब के बीच में ही एक छोटा सा तालाब और खोद दिया गया...खैर...बचपन की स्मृतियों का वह तालाब उसके लिए बहुत ही आकर्षक और सुंदर दृश्यों की याद दिलाता है...कुमुदिनी के खिले सफेद फूलों से सजा वह तालाब बहुत ही सुंदर दिखाई देता था...खास कर हम बच्चों के लिए...! उसमे...नहाना...तैरना...घंटों उस तालाब के किनारे समय बिताना हमारी आदत बन चुकी थी...अकसर मैं बाबू की निगाहों से अपने को बचाता हुआ वहाँ पहुँच जाता था...हाँ बाबू यानि मेरे दादा...चूँकि मुझे उस समय तैरना नहीं आता था इसलिए वह मुझे उसमें नहाने और वहाँ जाने से भी मना करते थे...काफी मिन्नतों के बाद मुझे इतनी अनुमति बाबू की ओर से मिली थी कि मै तालाब के किनारे तक जा सकता था लेकिन उसमें नहा नहीं सकता था...यही मेरे लिए बहुत था...क्योंकि बच्चों को उस तालाब में तैरते...पानी में डुबकी लगाते हुए दूर तक निकलते जाना...आदि...इन अठखेलियों को देखकर मैं बहुत आनंदित होता था...गाँव के ढेर सारे बच्चे वहाँ इकट्ठे होते थे...
     ऐसे ही एक दिन कुछ बच्चे उस तालाब में नहाने जा रहे थे, उन लोगों ने मुझे भी साथ चलने को कहा...लेकिन बाबू ने मना कर दिया...सारे बच्चे चले गए...मैं मनमसोसकर गुमसुम हो बैठ गया...कुछ देर यूँ ही बीतने पर अचानक बाबू की निगाह मुझ पर पड़ी...उन्होंने पूँछा, “कहो का बात अहई...” मैंने कहा, “कुछ नाहीं बाबू.” बाबू ने फिर पूँछा, “त...काहे मुह फुलाए बइठा अहा...|” उन्होंने कुछ समझते हुए फिर कहा, “जा तालाब पर...लेकिन हिलअ मत...जल्दी आयअ...|” बाबू कि तरफ से इतना अनुमति मिलते ही मैं दौड़ कर तालाब के किनारे पहुँच गया. वहाँ गाँव घर के बहुत सारे बच्चे जमा थे...कोई नहा रहा था...कोई तैर रहा था...कुछ बच्चे तालाब के किनारे के पेड़ों पर चढ़ उसकी डालियों से तालाब में कूद रहे थे, तो कोई एक तालाब में ही एक टापू जैसे स्थान पर पहुँच वहां कुमुदनियों की माला बना उसे गले में पहन और उसकी फलियों को दूसरे बच्चों की ओर उछल रहा था...यह सब देखकर मुझे बड़ा मजा आ रहा था...जब तब ख़ुशी के मारे मैं ताली भी बजा देता था...मै इधर अपने में ही मस्त था कि तभी मेरे ही हमउम्र एक लड़के की आवाज कानों में पड़ी, जो तालाब में उछल-कूद कर रहा था,विने...उंहा का बइठा हया...” तब तक दूसरा बोल उठा, “अरे अपने बाबू से पहिले पूंछि लेहीं...तब..” इतना कहते ही दोनों हँसने लगे| पहला बच्चा फिर बोला, “आवा आर...तोहरे बाबू के न बतावा जाए..” मुझे प्रतीत हुआ जैसे वे मेरा मजाक उड़ा रहे हों. इधर मेरे मन में भी तालाब में सब के साथ नहाने और खेलने की तीव्र इच्छा जाग चुकी थी, अचानक बेपरवाह सा तालाब में मैं कूद पड़ा...
            तालाब के पानी में, मैं किनारे पर ही उछल-कूद रहा था, क्योंकि मुझे तैरना नहीं आता था...तभी एक लड़का मेरे पास आया और तालाब में टापू वाले स्थान की ओर इशारा करते हुए वहाँ चलने के लिए कहा. चूँकि मुझे तैरना नहीं आता था...मैंने मना कर दिया...मैंने देखा वह तालाब के बीच उस छोटे से टीले पर तब तक पहुँच चुका था...वहाँ से मुझे वह फिर बुलाने लगा...मेरा भी मन अब वहाँ जाने के लिए तैयार हो चुका था...और मेरे बालमन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि मेरी लम्बाई उस लड़के से कम थी और वह थोड़ा बहुत तैर भी लेता था...मैंने धीरे-धीरे अपना पांव उस ओर बढ़ाने लगा...तालाब का पानी अब मेरे गर्दन के ऊपर तक पहुँच चुका था...और वह लड़का लगातार मेरा उत्साह बढ़ाते हुए मुझे पानी के बीच उस टीले तक आने के लिए प्रेरित करता जा रहा था...अरे...! यह क्या...अचानक मेरा पैर फिसल सा गया और मैं किसी गहरे गढ्ढे की  ओर जाने लगा...वहाँ से निकलना भी मेरे लिए कठिन हो गया...मैं अब डूबने लगा था...अचानक मेरा सिर पानी से बाहर आया लेकिन अगले ही पल फिर पूरी तरह मेरे सिर के ऊपर पानी हो गया...शायद मैं अब पानी में डूब रहा था...मुझे आज भी याद है जब मैंने उस एक क्षण में सोचा था... “काश..! कोई मुझे बचा ले...” जब मैंने अपनी आँखे खोली तो देखा यह छोटकऊ चाचा थे जो अपने दोनों बाँहों में मुझे उठाए हुए धीरे-धीरे सूखी जमीन पर पेट के बल लिटा रहे थे तथा मेरे पेट से पानी निकालने का प्रयास कर रहे थे...हाँ, यह छोटकऊ चाचा ही थे...उन्होंने मुझे डूबने से बचा लिया था..! वह भी अपनी परवाह न करते हुए, क्योंकि किसी डूबते हुए को बचाने में स्वयं डूबने का खतरा होता है...इस घटना के बारे में बाबू को उस समय तो कुछ पता नहीं चला, लेकिन एक दिन जब एक बड़ी सी बाल्टी को उल्टा कर मैं उस तालाब में तैरने का अभ्यास कर रहा था तो उन्होंने मेरी काफी पिटाई की थी..., हाँ...छोटकऊ चाचा... वह मुझसे चार या पांच साल बड़े थे...बचपन में हम लोग उन्हें कुछ-कुछ जिद्दी जैसा मानते थे और जब किसी बात को मनवाने में उनकी तर्कशक्ति जबाव दे देती तो लड़-भिड़ कर अपनी बात मनवाने की उनमें आदत थी...वह किसी पचड़े में भी पड़ने से नहीं डरते थे...इतना सब होते हुए भी उनमें भावुकता भी थी...
      मुझे याद है उक्त घटना के कई साल बाद...तब वह इलाहबाद में रहकर पढाई कर रहे थे...एक दिन सुबह ही मैंने देखा...छोटकऊ चाचा घर के बड़े लोगों का बारी बारी से पैर छू रहे थे...कहते जा रहे थे...ऊपर वाले ने मुझे बचा लिया...फिर अपने साथ हुई घटना के बारे में बताना शुरू किया, “हम रोज सुबह गंगा नहाई जाथ रहे...काल्हि जब हम गंगाजी में नहात रहे, अऊर गंगाजी के किनारे रहई वाले कुछ लरिकऊ नहात रहे...ओन्हन धारा के बीच में तैरि के दुसरे तरफ जाई के नहात रहइ...हमरेऊ मन भा कि हमहूँ ऊहीं जाई के नहाई..|” उनकी बात हम सब बड़े ध्यान से सुन रहे थे, उन्होंने आगे कहना शुरू किया, “हाँ त हमहूँ सोचे तैर के गंगा के बीच धारा वाले उथले रेता पर जाई...अऊर जब हम कुछ दूर नदी क धारा में पहुँचे त हम खड़ा होई क कोशिश केहे...लेकिन...इ...का.., हमरे पैर के नीचे से बलुअइ खिसकि गई...!” आगे इस प्रकार बताया...चूँकि नदी की धारा में थे इसलिए पैर टिक नहीं रहा था...फिर तैर कर किनारे आने का प्रयास किया, लेकिन नदी में तैरने का अभ्यास न होने के कारण तैरने में मुश्किल आ रही थी...उन्हें लगा कि वह डूब जाएँगे...क्योंकि तब तक वह थक चुके थे...तभी उनके दिमाग ने काम किया और नदी में पीठ के बल हो उसी की धारा के सापेक्ष तैरने की स्थिति में अपने को छोड़ दिया...उधर नदी के किनारे से लोग उनकी हिम्मत बंधा रहे थे...करीब इसी स्थिति में लगभग पांच सौ मीटर बहने के बाद वह किनारे पर नदी की धारा के बहाव के सहारे पहुँचे, वहाँ भी नदी का करार काफी ऊँचा था, उस गिरते करार में दबने का खतरा था...अंत में जैसे तैसे कर लोगों ने वहाँ से सहारा देकर निकाला...इसके बाद निढाल हो गए...! छोटकऊ चाचा किसी बड़े शहर में रहते हैं और पचड़े में पड़ कर निकलने की अपनी आदत आज भी नहीं छोड़ पाए हैं...
     न जाने क्यों उक्त छोटी सी घटनाओं को लिखने के लिए प्रेरित हुआ...हाँ...उस दिन पचड़ेबाजी में पड़ते तो किसी की जान बच सकती थी... सोचा..! यह लिखना भी तो एक पचड़ेबाजी ही है...! शायद...! किसी पचड़ेबाज को समझने का मौका मिले...!
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सोमवार, 17 सितंबर 2012

सहज प्रेम

             एक दिन मैंने देखा...मेरे घर के आगे वाले कमरे में जिसकी खिड़कियाँ अक्सर खुली रहती हैं...उसके रास्ते से...गौरैया का एक जोड़ा आकर कमरे में इधर उधर चक्कर काटने लगा...जैसे कुछ तलाश सा रहा हो... मैं कई दिनों तक जोड़े को कमरे में इसी तरह चक्कर काटते हुए देखता रहा...कभी कभी मुझे ऐसा लगता जैसे गौरैया का वह जोड़ा कुछ खोज सा रहा हो...एक दिन सुबह ही मैंने देखा...आलमारी में फ्रेम में रखी तस्वीर के पीछे की खाली जगह पर पक्षियों का वह जोड़ा बार बार आ जा रहा था...उस स्थान पर वह जोड़ा बारी-बारी से तिनके ला कर रख रहा था...कुछ दिनों तक चिड़ियों की यह क्रिया चलती रही...कुछ दिनों बाद में मैने देखा... एक खूबसूरत घोसला आलमारी में तस्वीर के पीछे बन कर तैयार हो चुका था...एक दिन एक चिड़िया उस घोसले में बैठी हुई दिखाई दी...मैंने देखा...वह इसी तरह से कई दिनों तक वहाँ बैठी रही...फिर मुझे वहाँ दो अंडे दिखे...इसके बाद वह चिड़िया वहाँ अकसर मुझे बैठी हुई दिखाई देती रही...
               कुछ दिनों बाद मैंने उस घोसले वाले स्थान पर पुनः ध्यान दिया... वहां नन्हें - नन्हें दो छोटे चिड़ियों के बच्चे नज़र आये...मैं घोसले के एकदम नज़दीक जाकर...उन चिड़ियों के बच्चों को देखने लगा...वे अपनी नन्ही-नन्हीं चोचों को मेरी ओर खोलकर चीं-चीं करने लगे...इतने में मैंने देखा...गौरैया कमरे में आकर चक्कर काटने लगी...मुझे अहसास हुआ...वह बच्चों को कुछ चुगाना चाहती थी...यह सोचकर मैं वहाँ से चला गया...मैंने ध्यान दिया...कुछ दिनों तक चिड़िया बच्चों को कभी-कभार आ कर ही चुगाती थी...और अकसर उनके पास बैठी रहती...इस तरह कुछ दिन बीत जाने पर...एक दिन मैंने देखा...चिड़िया बार-बार घोसले की तरफ आ-जा रही थी...बच्चों को चुगाती जाती...यही नहीं जोड़े के दोनों पक्षी इस काम में बराबर लगे हुए थे ...और लगातार बारी-बारी से दोनों बच्चों को बाहर मैदान से कुछ ला-ला कर चुगाते जा रहे थे...मैंने विशेष रूप से इस बात पर गौर किया कि जब चिड़िया के बच्चे बहुत छोटे एवं नवजात थे तो उन्हें भोजन की कम आवश्यकता थी और चिड़िया कभी कभार ही बच्चों को चुगाती थी ,लेकिन जैसे-जैसे बड़े होते गए वैसे-वैसे बच्चों को चुगाने की आवृत्ति बढ़ती गई...


              चिड़ियों की अपने बच्चों के प्रति प्रेम एवं सजगता आश्चर्य करने वाली थी...निःस्वार्थ भाव से चिड़ियों द्वारा अपने बच्चों की देखभाल करना प्रकृति के सहज प्रेम की अभिव्यक्ति थी....मैं मनुष्यों में इस सहज प्रवृत्ति को जैसे तलाशने लगा...!

शनिवार, 11 अगस्त 2012

नीम का दरख्त


           क्या नियमों एवं आदर्शों को व्यवहृत किया जा सकता है ! उसे इन सारे प्रश्नों का उत्तर पाना है--] इसके लिए वह क्या करे-----क्या अपना स्वयं का विश्लेषण कर डाले------! लेकिन उसका जीवन अति साधारण----! क्या इससे जीवन में उठने वाले बड़े प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है----! हाँ अब तक उसने जिन परिस्थितियों का सामना किया है वे साधारण ही तो रही हैं---हाँ तो क्या इनमें उसके मन में उठने वाले प्रश्नों का उत्तर खोजा जा सकता है------कहीं यह हास्य का विषय तो नहीं होगा-------!

          लेकिन इस जीवन में क्या तुच्छ से तुच्छ वस्तु का मूल्य नहीं है---! शायद है-----तभी तो तुच्छ से तुच्छ बातें भी होती हैं------या फिर कोई बात तुच्छ ही नहीं होती-----सब मन का भ्रम है----!

           उसके दादा जिन्हें वह बाबू कह कर सम्बोधित करता था उसके लिए एक ऐसे विशाल दरख्त के समान थे जिसकी घनी छाया में उसका बचपन निर्द्वन्द्व और निश्चिंत होकर बीता थाA हाँ-------उसी उसी विशाल नीम के दरख्त के समान जो उसके पुराने कच्चे घर के सामने दाहिनी ओर थाA वह पुरानी पुस्तैनी बखरी अब तो नहीं रही लेकिन वह नीम का दरख्त अपना वजूद बचाए हुए है हालाँकि उसकी कई विशाल डालें अपने आप गिरी और कुछ छोटी&मोटी डालों को लोगों ने काटा भीA एक बार जब उसके पक्के घर का निर्माण हो रहा था तो उसने उस घर के नक्शे में हेर&फेर करा दिया था और वह इसलिए कि नीम कि डालों को कटने से बचाया जा सकेA हाँ-------] घर के लोगों को इसका अहसास नहीं होने दिया था कि वह नीम की डालों को बचाने के लिए ऐसा कर रहा है------] शायद तब सफल न होताA

         हाँ-----]वही विशाल नीम का पेड़-----उसकी बड़ी&बड़ी डालें----टहनियाँ-----उसकी पत्तियां] उस पर----चुट-----चुट-------और दौड़ती गिलहरियां-----उसी की छाया में बीता उसका बचपन---! वह विशाल पेड़ उसके लिए कौतुहल का विषय भी थाA तभी तो छुटपन में एक बार बड़े भोलेपन से उसने अपने बाबू से उसके बारे में पूंछा था&

         ^^बाबू इ नीम क पेड़ तू लगाए रहा^^

         ^^नाहीं नन्ह्कवा इ हम नाहीं लगाए रहे^^] बाबू ने कहाA

         ^^त फिर तोहार बाबू लगाए रहा होंहि\^^ उसने फिर पूँछाA

         ^^नाहीं हमार ददा एका नाहीं लगाए रहेन^^] बाबू ने कहाA बाबू शायद अपने पिता को ^ददा^ कह कर संबोधित करते थे----A उसके बालमन की जिज्ञासा अभी शान्त नही हुई थीA उसने फिर पूँछा&

         ^^बाबू-----तू अपने दादा जी से एह नीमी क पेडे+ के बारे म फिर नाहीं पूंछाA^^ अब बाबू थोड़ा झल्लाते हुए बोले] इ बात पूंछे अउर बाते क जड़ पूंछे!^^ बाबू ने शायद ऐसा इसलिए कहा कि उनसे वह अकसर अपने बालमन की तमाम जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए ऐसे ही प्रश्न दर प्रश्न किया करता था और कभी कभी इस प्रश्नोत्तरी के दौरान जब वह थोड़ा अन्यमनस्क होते तो उससे कहते] ^^का हरदम भुकवावत रहत ह।^^ लेकिन ऐसा कहने में उसके द्वारा पूँछे प्रश्नों के प्रति उनमें उपेक्षा का भाव नहीं होता था क्योंकि अगले पल ही वह उसके प्रश्नों का उत्तर देना प्रारम्भ कर देते थे। हाँ------ बाबू तो उसके लिए प्राथमिक पाठशाला थे---- और वह इस बात को समझते थे। उस दिन बाबू नीम के बारे में उसकी जिज्ञासाओं को पुन% शांत करना शुरू कर दिए] ^^ल बतावत हई--- हाँ--- हमार आजऊ ई नीमी क पेड़ नाहीं लगाए रहेन--- अऊर ओनहूँ नाइ जानत रहेन कि एका के लगाए रहा--।^^ फिर बोले] हाँ--- त---ई--- पेड़ अढाई तीन सउ साल पुरान जरुर होए---।^^ इतना कह वह थोड़ी देर चुप रहे] फिर एक गहरी साँस लेते हुए उस नीम के तने जैसे उसके एक बहुत पुरान्रे टूटे डाल की ओर इशारा किया] और कहने लगे&

           ^^वह देखा---- जवने में खोडर बा--- अरे--- उंहीं में----- जेहमें उल्लुआ झाँकत बा----उहई---] अरे---! उ--- बहुत मोटी डाल रही--- एह पेडे क समझा आधा उहई रहा---] हमरे बहुत लरिकाई में गिरा रहा---^^ इतना कह चुप हो गए। वह उन्हें अब बहुत उत्सुकता से सुनने लगा था] और पूँछा]

         ^^बाबू--- एतनी बड़ी डाल जब गिरा रहा त केऊ दबान नाहीं रहा---।^^

          ^^नाहीं----बेटवा---केऊ दबान नाहीं रहा---!^^ बाबू की चुप्पी टूटी।

          ^^अरे भईया---] कईसे केऊ दबातइ---एह पेड़े मं देबी क बास रहथ न---^^ उसने दृष्टि घुमाई तो देखा पंडित बबा बाबू से यह कह रहे थे] जो बाबू और उसके बीच चल रहे वार्तालाप को सुन रहे थे।

          हाँ पंडित बबा उसके दादा यानि बाबू के छोटे भाई थे] उन्हें घर और गाँव के लोग ^पंडित के नाम से पुकारते थे। उनका यह नाम क्यों पड़ा बाबू ने उसकी इस जिज्ञासा को इस प्रकार शांत किया था]

          ^^पंडित इसकूल में पढ़े रहेन इही से गाँव वालेन इनका पंडित कहै लागेन।^^ उसकी जानकारी के लिए आगे उनहोंने और जोड़ा] ^^अरे--- ये ठीक से पढ़े रहेन होतेन त आज कतऊं संसकिरत क मास्टर होतेन--।^^ उसनें पूँछा] ^^काहे ठीक से नाहीं पढ़ेन---\^^ बाबू ने बड़े आत्मीयतापूर्ण लहजे में बताया] अरे--- ये ठीक से कईसे पढ़तेन----] पढाई क नाम से त इसकूल जाईं---- और उहाँ से चला जाईं ससुरारी---^^ 
             पंडित बबा ने फिर अपनी बात पूरी करनी शुरू की] ^^केतनी बार एह नीमी क डार गिरी भईया----! आखिर कोनौ खतरा भवा----नाहीं न----^^ फिर उसकी ओर मुखातिब हुए] ^^अरे---बचवा--- बताए न---एहमें देबी माँ क निवास अहै ^^ उस विशाल वृक्ष के चारों ओर बने चबूतरे की ओर इशारा करते हुए बोले] ^^इ देबी माँ क चौरा हमहीं बनवाए रहे-^^ वह नीम की डाली पर बंधी घंटियों को दिखाते हुए पूँछा] ^^बबा घंटी काहे बांधी बा^^ पंडित बबा उत्तर दिए] ^^देबी माँ से मनौती माना रहा जेकर मनौती पूरा भ उहई बांधेस-^
            ^^पंडित---तनी----सुरती बनावा---मैदान होई आई----।^^ उसके दादा पंडित बबा के इन बातों से ऊबते हुए से बोले। पंडित बबा सुरती मलते हुए दो तीन बार उसे हथेलियों के बीच थप थप करते हुए चूने की धूल को उड़ाया। इससे उसे दो तीन जोरदार छींकें आई। यह देख पंडित बबा मुसकराते हुए बोले] ^^देखअ---भईया-----! इ---सुरती---! बहुत तेज बा----!^^ ^^हाँ हो---कहाँ से लेहे रहाअ-----।^^ बाबू ने कहा। ^^अरे--- उंहीं से-----जहाँ से तू लेथअ----सेठ एका कोने वाले डब्बावा में रख्खथेंन----।^^ पंडित बबा अपनी सुरती की तेजी पर गर्व से बोले।^^
              छींकों के बाद उसने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमाया] अकस्मात् उसकी नजर पुनः नीम के उस कोटर की ओर गई। उसने देखा] उल्लू की दो बड़ी बड़ी आँखें कोटर में से झांक रही थी----और एक ^किलाहटी^ कोटर के पास मंडरा रही थी] दूसरी डाल के टूटे भाग पर बैठ ची&ची कर रही थी। उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वे उल्लू को कोटर से निकालना चाहती हों----। इतने में कुछ चिड़िया शायद वे चर्खी थी वहाँ आ गई और समवेत स्वर में सभी ने ची&ची करना प्रारम्भ कर दिया----। उन सब का शोर इतना अधिक था कि पंडित बबा बोल उठे] ^^एनहूँ ससुरन क----पता नाहीं कउन हिस्सा बाँट क झगड़ा बा----कि मनईयउन----से बढ़ी गयेंन-----।^^ इतना कहते बाबू की ओर सुरती वाला हाँथ बढ़ा दिए। चुटकी में सुरती लेते हुए बाबू ने अनुभवी अन्दाज में कहा] ^^नाहीं पंडित----अब संझा होत बा न----रात में एंह कोटरे में रहई क बारी किलहटीयन क अहई----एही से एन्ह्न उल्लुआ के निकालइ बदे हल्ला मचाए अहै-----।^^ पंडित बबा मुसकुराते हुए बोले] ^^तउ---तउ---।^^ बाबू एक हाँथ में लोटा और दुसरे में सोंटा ले वन की ओर चल दिए-----।  

   
          
           



          

सोमवार, 30 जुलाई 2012

कलुई


        उस दिन वह कुत्ता गाड़ी से टकराते-टकराते कैसे बचकर भागा था बरबस वह घटना याद आ जाती है. हाँ वह तेज चलती गाड़ी के ठीक सामने जो आ गया, उसे बचाने का कोई अवसर नहीं था और उसके ऊपर से मेरी गाड़ी तेज़ी से आगे बढ़ गई. ‘वोह! शायद मर गया..’,मैंने सोचा और पीछे मुड कर देखा. लेकिन यह क्या..!वह तो दिखाई ही नहीं दे रहा है...,शायद भाग गया..,लेकिन भागते हुए भी तो अगल-बगल कहीं नहीं दिख रहा है, तब तक साथ बैठे मेरे बच्चे मुझे कोसने लगे, ’नहीं गाड़ी चलाना आता तो क्यों चलते हो’..,’अब हम कभी आपके साथ गाड़ी पर नहीं बैठेंगे’..,’बेचारा कुत्ता दब गया’,आदि आदि.मैं भी थोडा चिंतित हो उठा यह सोचकर कि खामखाँ एक जान मेरे हाथ चली गई जबकि बचपन से मैं एक चींटी तक को मारना पाप समझता था. मैं गाड़ी से उतरा और चारों ओर नजर दौडाई लेकिन वह कहीं नहीं दिखा..,तभी कूँ-कूँ की धीमी आवाज सुनाई दी.., मैंने गाड़ी के नीचे झांक कर देखा, अरे..! यह क्या! मैंने देखा वह आगे की पहियों को जोड़ने वाले राड और चेचिस के बीच फंसा पड़ा है. उसे निकालने की तरकीब सोचने लगा..,मुझे लगा यदि गाड़ी को थोडा पीछे धकेला जाए तो शायद वह निकल जाए, फिर मैंने अकेले ही बोनट की ओर से धकेला, मुझे लगा अब वह नीचे गिर गया होगा और दुबारा नीचे झांककर देखा, अरे! यह क्या! वह कहाँ गया ! तब तक पास आ गए एक व्यक्ति की आवाज कानों में पड़ी, ‘वह... भागा... !’ नजर घुमाई तो देखा वह दूर खेतों में भागा जा रहा था उसे कोई गंभीर चोट नहीं लगी थी, मेरे जान में जान आई और गहरा संतोष का भाव चेहरे पर छा गया, मैं अपने बच्चों की तरफ देखकर विजयी भाव से मुस्कराने लगा...  

       न जाने क्यों मुझे उस समय ‘कलुई’ कि याद आ गई. मेरे हम-उम्र लगने वाले चाचा जो अब इस दुनियां में नहीं हैं, और दूसरा मैं. हम दोनों का कलुई से विशेष लगाव था. परिवार में एक बुजुर्ग जिन्हें हम लोग ‘ददा’ कह कर पुकारते थे, हम लोगों के ‘कलुई प्रेम’ से चिढ़ते थे..,उसी ‘कलुई’ ने जब पहली बार बच्चे दिए तो ददा ने कहा ‘सुरेशानंद और विनेकानंद’ का वंश चल गया’. वह अपने घर में अकेले ही रहते थे,क्योंकि उनका विवाह नहीं हुआ था, उनका देखभाल ह्मलोंगों के परिवार वाले ही करते थे. हाँ तो ददा जहां रहते थे वहाँ छोटी सी एक ‘गढ़हिया’ यानी एक तालाब था जो आज भी है लेकिन उसके कुछ हिस्से को पाट कर अब घर बना लिया है, हाँ तो उस तालाब के किनारे पर ही ददा का घर था. वहाँ झाडझंखार एवं चौड़े पत्तों वाले छोटे-छोटे पौधे हुआ करते थे जिन्हें हम ‘कंघी’ के नाम से जानते थे, साथ ही बांस की कोठ एवं इमली,नीम तथा कई अन्य प्रकार के पेड़ हुआ करते थे इससे वहाँ आसपास सदैव नमी बनी रहती थी और इसी नमी एवं झाडझंखार के बीच ‘महोख’ नामक कई पक्षी रहा करते थे हलांकि आज भी यदा-कदा कोई एकाध दिख जाता है. उनमें से कोई एक जब ‘पूऊत...पूऊत... पूऊत’ ‘कर बोलना शुरू करता था तो दूसरा भी उसी सुर में अपना सुर मिलाने लगता था. इस ‘पूऊत...पूऊत...’ से काफी शोर होता था और ददा इससे बहुत चिढ़ते थे तथा उन पक्षियों पर ’हड-हड ससुरे’ कह चिल्लाने लगते थे. ‘ददा’ से उनके इस चिढ़ का हम अपने तरीके से बदला भी ले लिया करते थे. हम तीन बच्चे अकसर जब वे सोए रहता थे तो उनसे कुछ दूरी पर खिड़की के पीछे खड़े हो ‘पूऊत...पूऊत... पूऊत’ तेज आवाज में बोलना शुरू कर देते थे, और ददा जग कर अपने ‘सोंटे’ को लकलकाते हुए हमारी तरफ दौड़ते थे और कभी-कभी उस डंडे को हमारी ओर फेंक कर मारने का प्रयास कर अपने गुस्से को शांत कर लिया करते थे, खैर हमारा बदला भी पूरा हो चुका होता था. लेकिन ‘कलुई’ बहुत समझदार थी घर का दरवाजा खुला होने पर भी वह घर के अंदर तक नहीं जाती थी, बाहर बैठकर ही ‘कौरे’ का इंतजार करती रहती थी. खाने के बाद हम सभी रोटी के बचे टुकड़े उसे दिया करते थे. रात में उसके भौंकने कि कुछ अदा ऐसी होती थी जिसे पहचान मेरे बाबा कहा करते थे, ’कोई बात जरूर है तभी भौंक रही है’ और उसके भौंकने का कारण पता करने पर उसे अकसर कई बार सांप या बिच्छुओं का रास्ता रोकते हुए पाया था. और जब कलुई मरी थी.....,तब हम बड़े हो चुके थे, हम लोंगों ने उसके मृत शरीर को फूलों से सजाया था..., हमने कब्र खोदी..., और दफनाया था. 

         ‘कलुई’ से संबंधित एक घटना आँखों के सामने घूम गई.उस समय मेरी उम्र ७-८ वर्ष के आस-पास रही होगी.उस दिन हम सारे बच्चे एक छोटे से पिल्ले को लेकर परेशान थे. हाँ, हम बच्चों ने  उसे ‘कलुई’ नाम दिया था क्योंकि एक तो वह मांदा थी दूसरे उसका एकदम काला  रंग ! जब मैंने उसको पहली बार देखा था तो दंग रह गया था . अरे ! क्या गजब का साहस था उसका ! नन्हीं जान!, दो-ढाई महीने की..!, अकेले..! तीन-तीन मुसदंडे कुत्तों का मुकाबला कर रही थी! हाँ, एक घर के लिए खुदे नींव के इस ओर अकेले वह और दूसरी ओर वे तीनों कुत्ते ! जो उसे देखकर भौंके जा रहें थे, वह भी उसी अंदाज में अपनी नन्हीं सी ऐंठी पूंछों के साथ निडरता से बौं-बौं किए जा रही थी. मैं बड़े ध्यान से उसे देखने लगा, मुझे लगा जैसे मैं किसी ऐसे गुरु से शिक्षा प्राप्त कर रहा हूँ जो मुझे साहसी बनने की सीख दे रहा हो. मैं धीरे से आगे बढ़ा और उसे अपनी गोंदी में उठा लिया..!

       घर पर हम कई सारे बच्चे मिलकर उसका देख-भाल करने लगे. हम बच्चों की दिनचर्या उसी से शुरू होती थी. अल-सुबह उठते ही हम उसके पास पहुंच जाते थे और उसके साथ खेला करते थे. एक तरह से हम सब के लिए वह मनोरंजन का साधन भी थी. मेरी एक बुआ जो मुझसे दो-तीन साल बड़ी थी उसे बहुत प्यार से खाना खिलाती थी उनका भी उस ‘कलुई’ से बहुत लगाव था. हम बच्चे ‘कलुई’ को खाना खिलने की जिम्मेदारी उन्हीं को सौंप दिए थे. ऐसे ही कुछ दिन बीते थे कि एक दिन बहुत सबेरे ही कलुई....कलुई.....पुकारती आवाज कानों में पड़ी यह बुआ की आवाज थी कुछ घबड़ाहट भरी, मैं भी चौंक कर उठ गया और बुआ के पास गया यह जानने की बात क्या है. बुआ ने बताया,‘कलुई’ दिखाई नहीं दे रही है’, ‘वह कहाँ गई’....,यह सोचकर मैं भी चिंतित हो उठा. वह अभी बहुत छोटी थी..बुरे ख्याल मन में आने लगे. तब तक हम कई बच्चे इकठ्ठा हो गए, फिर हम लोंगों ने मिलकर उसे खोजना शुरू किया, दोपहर हो गया...,लेकिन वह नहीं मिली !

      मुझे याद आता है उस दिन हम सारे बच्चे बहुत दुखी थे. कितनी प्यारी थी वह..,खेलते समय वह भी हम लोंगों के साथ दौड़ा करती थी...लेकिन वह कहाँ और किस हाल में होगी फिर मिलेगी या नहीं ...,बार-बार ऐसे ख़याल मन में आ रहें थे. ऐसे ही सोचते-सोचते दोपहर के तीन-चार बज गए. तभी किसी ने आवाज दी ‘अरे ! देखो! शायद यहाँ है’ और ईख की सूखी पत्तियों के गट्ठर की ओर इशारा किया. फिर हम सभी बच्चे मिल उसे वहाँ खोजना शुरू कर दिए.सारे गट्ठर को हम लोगों ने उलट-पलट डाला लेकिन वह नहीं मिली, हाँ उसमें से एक बिल्ली निकल कर भागी. हम सभी निराश हो पास ही कुँए की जगत पर बैठ गए. वहाँ बैठे हुए कुछ ही देर हुआ होगा कोई चिल्लाया, ‘अरे ! वह देखो ! कलुई आ रही है !’ हम लोगों ने देखा दूर बाग के बीच रास्ते से वह भागी चली आ रही है, सभी बच्चे उसकी ओर दौड़ पड़े, हम सभी ने बारी-बारी से उसे अपनी गोंदी में उठाया जैसे इत्मीनान कर लेना चाहते हों कि वह हमारी ‘कलुई’ ही है......हाँ उसी प्रसन्नता की अनुभूति उस भागते कुत्ते को देख कर हुई.

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रविवार, 8 जुलाई 2012

सत्यमेव जयते


          आमिर खान के शो ’सत्यमेव जयते’ में आज जातिवाद, छुआछूत आधारित सामाजिक भेदभाव जैसी कुप्रथा को मुद्दा बनाया गया। इसे देखकर कुछ यादें ताजा हो गयी! बचपन में कपड़े सीने का काम करने वाला एक आदमी अकसर हमारे घर आया करता था। वह घर से कपड़े लेकर उन्हें सिलकर फिर घर पहुँचा दिया करता था। एक बार हमारे घर पर किसी की तेरहवीं पर भोज का कार्यक्रम था उसे भी निमंत्रित किया गया था। खाना खाने वाले लोगों की पंक्ति के बीच में बैठकर वह भी भोजन कर रहा था। उसे इस तरह लोगों के बीच पाँत में बैठकर खाना खाते हुए देखकर घर के ही एक सदस्य ने कुछ बडबडाते हुए उसकी ओर इशारा किया और फिर मैनें उन्हें उस व्यक्ति को खाने वाले लोंगों की पाँत से उठाते देखा। वह उस बेचारे को सबसे अलग बैठ कर खाने के लिए कह रहे थे क्योंकि वह तथाकथित एक दलित जाति से था। लेकिन तब उस व्यक्ति ने अपने को बहुत अपमानित महसूस किया था। फिर उसने खाना नहीं खाया और वह उठकर चला गया था। आज भी वह घटना मुझे बरबस याद आती रहती है अपमान बोध से पीड़ित वह फिर कभी हमारे घर दिखाई नहीं दिया।

       इसी तरह स्कूली दिनों का मेरा एक अन्य अनुभव रहा है। मैं इंटर प्रथम का छात्र था उन दिनों कभी-कभी मैं अपने स्कूटर से कालेज चला जाता था। मेरे गाँव का ही मेरा एक सहपाठी भी मेरे साथ मेरी ही कक्षा में पढ़ता था। अकसर मैं अपने उस सहपाठी मित्र के भी स्कूटर पर बैठाकर कालेज चला जाता था। उसे इस तरह हमारे साथ स्कूटर पर बैठ आते-जाते देख हमारी कक्षा के तथाकथित ऊँची जाति के छात्र मेरी खिल्ली उड़ाया करते थे कि मै एक दलित जाति के छात्र को अपने स्कूटर पर क्यों बैठाता हूँ।

               उक्त बातें तो मेरे अपने अनुभव का विषय रहा है लेकिन मेरे एक परिचित ने बातों-बातों में ही अपनी एक ऐसी पीड़ा को मुझसे व्यक्त किया जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को सोचने पर विवश कर सकता है। वह सरकारी सेवा में हैं तथा उन्होंने बताया कि कैसे अनुसूचितजाति वर्ग में पैदा होने के कारण उनके बच्चों कि पढ़ाई बाधित हुई थी! 
            पहले उनके बच्चे गाँव में पढ़ते थे। जब वे सरकारी नौकरी में आए तो वह बच्चों को शहर में पढाना चाहते थे, लेकिन शहर में उन्हें किराए का घर इसलिए नहीं मिल पाया था कि वह एक दलित जाति से थे। कोई उन्हें किराये पर अपना घर देने के लिए तैयार नहीं होता था। इस कारण से उनके बच्चों की स्कूली शिक्षा तीन वर्ष पीछे हो गई थी। 

            वास्तव में जातिगत भेदभाव के मनोरोग को हम आज भी देख एवं सुन सकते हैं, शहरों में हो सकता है यह कुछ कम दिखाई दे लेकिन गाँवों में यह अपने उसी वीभत्स रूपों में आज भी है जैसा कि आमिर ने अपने शो में दिखाया। हम दलितों की इस पीड़ा को दलित हो कर ही अनुभव कर सकते हैं इस समाज के प्रति उनके विद्रोह के स्वर बेहद जायज हैं। और जब तक शेष समाज भी इस पीड़ा को उसी शिद्दत से अनुभव नहीं करता यह मनोरोग समाप्त होने वाला नहीं है। आमिर को साधुवाद !

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बुधवार, 16 मई 2012

खेल


          बहुत दिनों के बाद गांव में मैं अपने खेतों की ओर गया | खेतों से सटा हुआ कई एकड़ में फैला एक मैदान था जिसमें तरह-तरह की झाडियों के साथ कई प्रकार पेड़ भी थे | बचपन से ही मैंने लोगों को उस मैदान को वन के नाम से पुकारते हुए सुनते आया था | पूजा एवं त्योहारों के अवसर पर प्रसाद आदि बांटने के लिए वहाँ से ढाक के पत्ते तोड़ कर लाया करता था वहीँ से हम बच्चे तुलसी के पौधे लाकर घरों में लगाया करते थे | उसी वन के एक किनारे सड़क के दूसरी ओर स्थित विद्यालय में पढ़ाई के समय हम बच्चे वन के खाली मैदान में खेला भी करते थे | कई बार हम बच्चे उस वन में मोरों के झुंड को घूमते तथा उन्हें नाचते हुए भी देखा था तथा झाडियों में घूमते खरगोशों को पकड़ने की कई बार कोशिश भी की थी | बरसात के दिनों में वहाँ छोटे-छोटे तालाबों,गढ्ढों में पानी भरने के साथ मेंढकों के टर्राने की आवाजें भी सुनी थी | संवेदनशीलता का पाठ बचपन में ऐसे ही वातावरण से सीखा था |

           आज उसी वन को कई फिट ऊँची ईटों की चहारदीवारी से घेर दिया गया है तथा उस स्थान को मशीनों से समतल कराया जा रहा था | पूंछने पर गांववालों ने बताया कि उस भूमि को गाँव के ही एक व्यक्ति ने बेंच दी है अब यहाँ एक इंजीनियरिंग कालेज खुलेगा | लेकिन मैं उस वनभूमि को अब तक ग्रामसभा के स्वामित्व में ही समझते हुए आया था , इसके उत्तर में ग्रामवासी ने बताया कि बेचनेवाले ने कई वर्षों पहले ग्रामसभा से अपने नाम से उस भूमि का पट्टा करा लिया था , हालाँकि वह पट्टा गलत था क्योंकि वह स्वयं उस समय प्रधान भी था और समाज के तथाकथित उच्चवर्ग से था | उस पट्टे का विरोध करनेवालों को न्यायालय में भी सफलता नहीं मिली | यह सुनकर मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने कमजोर वर्ग के भूमिहीनों की भूमि पर डाका डाला हो और समाज में उन्हें सदैव के लिए कमजोर और दुर्बल बने रहने के लिए अभिशप्त कर रखा है और उनकी सुनने वाला कोई नहीं है , क्योंकि यह लाखों का सौदा था |

            मुझे उस नवनिर्मित चहारदीवारी के ऊपर एक मोर नजर आया , मैंने सोचा वहाँ खुलने वाला इंजीनियरिंग कालेज क्या प्रकृति की इंजीनियरिंग से बड़ा है या फिर सब पैसों का खेल है !

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रविवार, 29 अप्रैल 2012

सामन्तवाद:एक मानसिक तत्व



          रामचरितमानस में एक चौपाई है-
    रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाय पर वचन न जाई।
         यहाँ चौपाई के इस कथन में निहित वह ‘मानसिक तत्व’ विचारणीय है जो सामंतीय दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति के साथ दूसरों को भी सम्मोहित करने का कारण बनती है क्योंकि इस ‘प्रण’ में एक तरह का ‘मानसिक अहंकार’ और उसका ‘नैतिक पक्ष’ बिम्बित हो रहा है इस तरह का कथन और यह निर्णय एक शक्तिशाली व्यक्ति ही ले सकता है; एक साधारण व्यक्ति यह सोच भी नहीं सकता। ऐसे 'मानसिक अहंकार' और इससे निर्मित ‘मानसिक तत्व’ जनित व्यवस्थाओं में आज के लोक मानस की दशा और दिशा विश्लेषण का विषय हो सकता है। शाब्दिक अर्थों में उक्त चौपाई की भावनाओं का गर्व और प्रशंसा के साथ उल्लेख किया जाता है तथा एक धार्मिक विशेषण के रूप में भी इसका प्रयोग होता हैलेकिन इसके विश्लेषण से प्रतीत होता है कि एक ताकतवर और स्वयं को शक्तिशाली समझनेवाला व्यक्ति जो दूसरों कि भावनाओं और स्थितियों की अनदेखी करता हो वही ऐसा कह और कर सकता है, इस तरह का ‘मानसिक तत्व’ ही प्रकारान्तर से धीरे-धीरे सामंतवादी मानसिकता में बदल जाता है। इस 'मानसिक तत्व' को किसी धर्म, जाति या क्षेत्र विशेष के लोगों तक ही सीमित नहीं किया जा सकता इस चौपाई के कथ्य के पीछे के मनोवैज्ञानिक प्रभाव के विश्लेषण में यह भी पता चलता है कि कोई व्यक्ति अपने किसी निर्णय या विचार से समाज या किसी व्यक्ति को प्रभावित करने के लिए उसे नैतिकता या धार्मिकता की भावनाओं के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। यह व्यक्ति स्वयं को अन्य लोगों के समक्ष श्रेष्ठजन के रूप में भी प्रस्तुत करता है; इसके प्रभावस्वरुप आम जनमानस ऐसे व्यक्ति की बातों का विरोध नहीं कर पाता और समाज भी दिग्भ्रमित होता रहता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति अपनी श्रेष्ठता को प्रतिपादित करते हुए इस स्थिति का बड़ी चतुराई से अपने स्वार्थ की प्रतिपूर्ति में दुरूपयोग करता है तथा यहीं से एक प्रकार की सामंतवादी मानसिकता निर्मित होने लगती है।
        
        भारतीय समाज जाति आधारित ऊँच-नीच के भेद-भाव से पीड़ित समाज है, वास्तव में इसके मूल में हमारी एक दूसरे से श्रेष्ठता अर्जित करने का भाव रहा है। श्रेष्ठता अर्जित करने का यह भाव कोई अस्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं है क्योंकि प्रकृति में ‘उत्तरतम के जीवितता’ का सिद्धांत इसे प्रकृतितः पुष्ट करता है। लेकिन भारतीय सामजिक-सांस्कृतिक विकास के क्रम में इस प्रवृत्ति के विकसित होते जाने के जैविक कारणों से इतर अन्य कारण रहे हैं। इसका कारण हमारी धार्मिक मान्यताओं के मूल में छिपा है, वैदिक युग में आज की जैसी जातिवादी व्यवस्था नहीं थी, पुरुषसूक्त के जिस श्लोक को लोग जातिवादी व्यवस्था की उत्पत्ति का आधार मानते हैं वह मात्र मानव का गुण कर्म के आधार पर विभेद था, यह श्रेष्ठता जन्मना नहीं थी। वैदिक युग की उक्त व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति अपने गुण-कर्मों के आधार पर किसी भी वर्ण में शामिल हो सकता था, ‘अहम् ब्रह्मासि’ की भावना सभी के लिए सामान थी और पिंड ही ब्रह्माण्ड है जैसी मान्यताएं प्रमुख थी। लेकिन यह दार्शनिक दृष्टिकोण आरण्यक चिंतकों में ही विशेष रूप से प्रचलित था, चूँकि यह मान्यताएं दुरूह और आमजन के समझ में आने वाली नहीं थी इसलिए वैदिक कालीन मान्यताओं का स्वरुप धार्मिक आधार ग्रहण नहीं कर पाया था। अतः उस समय किसी भेद-भाव या ऊँच-नीच की मान्यता के लिए कोई वैचारिक या धार्मिक धरातल प्रस्तुत नहीं था और अच्छे बुरे की धर्म-अधर्म के रूप में व्याख्या भी नहीं की गयी थी। धीरे-धीरे समाज में जटिलता बढ़ने के साथ ही सामाजिक क्रियाशीलता में भी वृद्धि हुई फलस्वरूप जो दार्शनिक मान्यताएं मात्र अरण्यों तक ही सीमित था महाकाव्यकालीन युग में धीरे-धीरे धार्मिक-स्वरुप ग्रहण करते हुए जन सामान्य में पहुँचने लगा तथा प्रतीकों के रूप में इनका सरलीकरण भी हुआ। प्राकृतिक आपदाओं एवं व्याधियों तथा अन्य ऐसे ही कारणों से भयभीत मानव मन को धार्मिक मान्यताएं कुछ आश्वस्त करती प्रतीत हुई। परिणामस्वरूप इस भय ने ही एक दार्शनिक विचारधारा को धार्मिक विचारधारा में बदलते हुए भक्ति-सापेक्ष ईश्वरवादी अवधारणा को विकसित किया। भय की इस आधारभूमि पर विभिन्न धार्मिक विचारधाराओं या मतों का विकास होता चला गया। यहाँ उल्लेखनीय है कि भय की आधारभूमि पर ही धार्मिक भावनाओं का विकास होता है।
          ईश्वर-उपासना की अवधारणा एक तरह से सामंतवादी विचारधारा की अभिव्यक्ति है जिसने सामंतवादी विचारधारा के लिए ‘मानसिक तत्व’ के निर्माण में योगदान दिया। हमारी ईश्वरीय मान्यताओं में इस तरह की सोच प्रतिबिंबित होती है; जहाँ हम ईश्वर में सर्वशक्तिमान जैसे गुणों की कल्पना करते हैं जो हमारे लिए असंभव होता है और इन गुणों के प्रतीक के रूप में ईश्वर की उपासना करने लगते हैं। इस ईश्वरीय काल्पनिक गुण से हमारी जो दूरी है वही सामंतीय मानसिकता को पोषित करती है। उपासना पद्धति में ईश्वर और उपासक के बीच निर्मित काल्पनिक दूरी को उभारा जाता है यही भावना ईश्वर के प्रति हमारी श्रद्धा का आधार बनती है। इसी श्रद्धा-भाव को उस सामंत या राजा के प्रति जगाया गया और उसे भी ईश्वर का अंश घोषित किया गया जो मात्र ऊँच-नीच की भावना से ही अपनी शोषणकारी शक्ति अर्जित करता था। इस पूरी प्रक्रिया में हम अपने लिए एक ऐसा ‘मानसिक तत्व’ निर्मित करते हैं जिससे एक ऐसे समाज का निर्माण होता है जिसमें लोग यथास्थितिवादी, भेद-भाव एवं ऊँच-नीच की मान्यताओं से पीड़ित होते है। धीरे-धीरे भारतीय समाज में इसी भावना ने ‘बेचारगी’ का भाव भी उत्पन्न कर दिया।
          महाकाव्य-काल में ईश्वरवादी भावनाओं को व्यापक आधारभूमि प्राप्त हुई वास्तव में भारतीय जनमानस के लिए महाकाव्य-कालीन चरित्र स्वयं में नायक थे लेकिन इस नायकत्व का महिमामंडन आम-जन की उस बेचारगी के आलोक में किया गया जहां सामान्य-जन शक्तिहीन बन उसी नायक पर निर्भर रहे। कभी-कभार आम-जन को शक्तिमान बताने का प्रयास भी इन महिमामंडित चरित्रों के लिए ही इनके दासत्व-भाव को उभारते हुए किया गया। महाकाव्यकालीन चरित्रों में ईश्वरवाद ने वैदिक विचारधारा “अहम् ब्रह्मास्मि” या इस जैसी ही सबके बीच समरसता की भावनाओं (सर्व खल्व इदं ब्रह्म) को पोषित करने की अन्य अवधारणाओं को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया। अब भक्ति और योग संपृक्त कर्म भी हमारी जड़ता को तोड़ नहीं पाया क्योंकि आम भारतीय-जन दार्शनिक मान्यताओं के इस गूढ़ार्थ को समझ नहीं सका। यहाँ आकर दार्शनिक विचारधारा की व्याख्या धार्मिक विचारधारा के रूप में इस प्रकार से किया गया कि इसके केंद्र में व्यक्ति न होकर ईश्वर को मान लिया गया। सारी धार्मिक क्रियाओं में प्राकृतिक शक्तियों का ईश्वर के रूप में मानवीकरण कर इनका आवाह्न भी मात्र व्यक्ति को स्वयं के दुखों से मुक्ति के लिए किया गया। इस प्रकार ऐसी धार्मिक क्रियाओं में व्यक्तियों में ही ऊँच-नीच की भावना घर करती चली गयी तथा इसने हमें एक सुविधाभोगी समाज में परिवर्तित कर दिया। प्रकृति से ही सीखी गयी वैदिक सूक्ति ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया’ की भावना क्षीण होते हुए 'मैं और बाकी सब मेरे लिए' का भाव विकसित होता चला गया तथा आम-जन उद्देश्यहीन हो निराशा के गर्त में चला गया।
              इस ‘निराश’ और ‘भयभीत मन’ ने अपनी इस बेचारगी के कारण पौरोहित्यवाद को प्रश्रय दिया और पौरोहित्य-वर्ग ने अपनी महत्ता बनाए रखने के लिए दार्शनिक दृष्टिकोणों को धार्मिक आधार प्रदान कर प्राकृतिक शक्तियों का प्रतीकों के रूप में मानवीकरण किया। भयभीत मानव-मन इन प्रतीकों की उपासना में ही अपनी समस्याओं का हल खोजने लगा और दार्शनिक मतों की ईश्वर-केन्द्रित इस व्याख्या से सामंतीय मनोवृत्ति का विकास हुआ। इसी पौरोहित्यवाद ने पाप और पूण्य के खेल में भोले-भाले आम-जन को श्रेष्ठ एवं निम्न में विभाजित कर दिया। यहाँ आकर स्थूल धार्मिक कर्मकांडों को श्रेष्ठ बताते हुए श्रम-साध्य कार्यों को हीन मानते हुए एक तरह से इसे सांसारिक बताया जाने लगा और निष्क्रियता जैसी अवस्था को मनुष्यों के लिए मुक्ति का श्रेष्ठ मार्ग घोषित कर दिया गया। अब श्रमिक वर्ग की उपेक्षा होने लगी थी तथा समाज कई श्रेणियों में विभाजित होने लगा था। बाद में यह विभाजन गुण-कर्म के आधार न होकर जन्म पर आधारित मान लिया गया।          
         यहाँ विशेष उल्लेखनीय यह है कि धार्मिक-पौरोहित्यवाद की प्रस्तुत की गई ईश्वरवादी उपासनापरक अवधारणा में श्रमिक-वर्ग उपेक्षित था फलतः इसकी शेष समाज से भी दूरी बढती गयी तथा वह केवल श्रमिक भर रह गया था। इस पौरोहित्य वर्ग ने स्वयं को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए ईश्वर-भक्ति का प्रतिपादन कर, राजा को भी ईश्वर का अंश घोषित कर दिया। यहाँ पर आकर एक ऐसा ‘मानसिक तत्व’ निर्मित हो चुका था जिसमें ‘मानसिक अहंकार’ और ‘नैतिक पक्ष’ का चतुराई-पूर्ण सम्मिलन था। इस ‘मानसिक तत्व’ से जन्मे सामंतवाद ने इसे ही अपना प्रमुख हथियार बना लिया। राजा के विरोध को अनैतिक मानते हुए सांसारिक समस्याओं से जूझने की आम-जनों की शक्ति को क्षीण करते हुए इसे माया और मुक्ति के मार्ग में बाधक घोषित का दिया गया। निराश भयभीत भारतीय जन-मानस को दूसरों की अराधना में ही त्राण का मार्ग तलाशने के उपदेश दिए जाने लगे। इन लोगों ने यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:...कह भय से मुक्ति हेतु अवतारवाद की भी परिकल्पना कर आम-जन से इन स्थितियों से मुक्ति हेतु स्वयं के प्रयास का अवसर भी छीन लिया। जीवन को सहजता के साथ और प्राकृतिक ढंग से जीने वाले आम भारतीय जनमानस को अवतारवाद की अवधारणा ने इस हद तक प्रभावित किया कि किसी भी सामाजिक अन्याय को भी ऊपर वाले की देन या भाग्य का खेल मान उसे चुपचाप सहने को उसने अपनी नियति मान लिया। पौरोहित्य-वर्ग एवं सामंतों द्वारा पुरुषसूक्त के श्लोक की मनुस्मृति में ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की गई कि एक जन्मना जातिवादी समाज स्थापित हो गया। इस पूरी प्रक्रिया से पुरोहित एवं सामंत सुरक्षित हो गए अब इनकी शक्ति को चुनौती देने वाला कोई नहीं था। इस प्रकार भारत की दार्शनिक धार्मिक परम्पराओं ने एक ऐसा ‘मानसिक तत्व’ निर्मित किया जिसने भारतीय समाज में सामंतीय दृष्टिकोण के साथ इसे एक जातिवादी समाज में स्थाई रूप से विभाजित कर दिया।  
           अब विभाजित भारतीय समाज के लिए मुक्ति का मार्ग जैसे बंद हो चुका था इस जातिवादी ढाँचे के कमजोर वर्ग को अपनी नियति इसी व्यवस्था में दिखाई पड़ रही थी। ईसापूर्व की युद्धग्रस्त परिस्थितियों के समय की भारतीय मानसिकता के बारे में इतिहासकारों ने लिखा है कि युद्ध के समय भारतीय किसान लड़ाई के मैदान के पास ही इससे प्रभावित हुए बिना अपने खेतों में हल चलाता रहता था। इतिहासकारों का यह कथन उस समय के कमजोर एवं मध्यमवर्ग की मानसिकता को प्रतिबिंबित करती है| आखिर वह ऐसी कौन सी मानसिकता थी जिसके कारण यह वर्ग ऐसे युद्धों से अप्रभावित रहता था जबकि इसका प्रभाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उसपर अवश्य पड़ता? 
          ऐसे युद्धों से आम-जन के अप्रभावित रहने का कारण उस समय के शासकों का जनता के हितों पर ध्यान न देना भी रहा होगा तथा युद्ध केवल व्यक्तिगत हित के लिए ही लड़े जाते रहे होंगे। इस सम्बन्ध में विशेष बात यह भी रही होगी कि जातीय समूहों में बटे समाज पर इन युद्धों से कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला था क्योंकि जातीय वर्गों का विभाजन इस प्रकार से किया जा चुका था कि इसके निचले पायदान पर खड़ा व्यक्ति इन लड़ाइयों के परिणामों से अप्रभावित रहता अर्थात श्रमिक या मध्यम वर्ग के लोग अपनी स्थितियों के लिए अभिशप्त थे। उस समय का शासक वर्ग वह चाहे कोई भी रहा हो जनता का शोषक ही अधिक रहा होगा और सारा कुछ उसके ऐश्वर्य के लिए ही होता रहा हो, अतः ऐसी स्थितियों में आम-जन का इन युद्धों से अप्रभावित रहना शायद स्वाभाविक ही था। 
          वास्तव में युद्ध जैसी परिस्थितियों में भी आम-जन की यह उदासीनता हमारे समाज में जड़ता के प्रतीक के रूप में प्रदर्शित हो रही थी तथा हमारी जन्मना जातिवादी विचारधारा से ही यह जड़ता और पुष्ट होती गयी जो आज भी जारी है। शायद भारतीय साहित्य में इसी भावना को कोऊ नृप होऊ हमई का हानीके रूप में व्यक्त किया गया है, इसे हम यथास्थितिवादी एवं भाग्यवादी सोच के प्रतीक के रूप में भी ले सकते हैं। इस सोच का कारण उस ईश्वरवादी विचारों में ही निहित है जहाँ हमने ईश्वर को ही सब कुछ मान कर अपने को उससे दूर खड़ा कर स्वयं को आराधक की श्रेणी में स्थापित कर लिया है और अवतारवाद की परिकल्पना कर त्राण के लिए उसके उपर निर्भर हो गए। इस मानसिकता के कारण हमे अपनी समस्याओं से मुक्ति के लिए सदैव एक ‘हीरो’ की आवश्यकता रही है, शायद इसी कारण स्वयं अपनी समस्याओं से हम नहीं जूझते बल्कि अपने अवचेतन में पराधीनता जैसी मानसिकता लिए हुए दूसरों के माध्यम से ही इन समस्याओं का निदान खोजते हैं। सच तो यह है हमारी इस मानसिक कमजोरी का लाभ हमारे ही समाज के चालाक वर्ग उठाते रहे हैं और येन-केन प्रकारेण अपनी महत्ता स्थापित कर हमें दिग्भ्रमित भी करते रहते हैं; अन्ततः भ्रष्टाचार का जन्म भी यहीं से प्रारम्भ हो जाता है। प्रकारान्तर से वे लोग ऐसा सामन्तवादी खोल विकसित कर लेते हैं जिसे भेदना जन-सामान्य के लिए दुष्कर हो जाता है। बड़े ही चालाकी से समाज के ऐसे तत्व अपने खोल की सुरक्षा का दायित्व भी हमें सौंप कर हमें उपकृत करने अहसास भी जगा देते हैं।
          
              इस प्रकार इन प्रवृत्तियों ने हमारे समाज को तमाम दायरों में बाँट दिया, जिसका दंश हम जातिवाद एवं सामाजिक असमानता के साथ ही सामंतवादी मानसिकता के रूप में आज भी झेल रहें हैं। "वसुधैव कुटुम्बकम" की हमारी भावना भी हमें अवास्तविक सी प्रतीत होती है, क्योंकि हम अपने ही समाज में वास्तविक एकता स्थापित नहीं कर पाए। आज भी हम देखते हैं कि भारतीय समाज ऐसी ही मानसिकता से पीड़ित है, हम अपनी इन दुर्व्यवस्थाओं को नजरअंदाज करते हुए अपने पांच हजार साल के इतिहास का उल्लेख महानता के इस गर्व के साथ करते है कि आज भी हमारे यहाँ पुरानी परम्पराएं जीवित हैं। हमने कभी यह जानने का प्रयास नहीं किया कि यदि हमारे यहाँ प्राचीन परम्पराएं आज भी जीवित हैं तो उसके पीछे के क्या कारण रहे हैं, और इस पर गर्व भी किया जा सकता है या नही या फिर हमारे समाज के मानवीय पक्ष के साथ उसके सामाजिक, आर्थिक विकास में इन परम्पराओं का कितना योगदान रहा है?
              एक प्रकार से हम निर्मित उस ‘मानसिक तत्व’ से सांस्कृतिजन्य बेचारगी की जड़ता के शिकार हो गए हैं। आमजन की इस संस्कृतिजन्य बेचारगी वाली मानसिकता के कारण ही कुछ लोग अपने को श्रेष्ठ जन के रूप में प्रस्तुत कर एक शोषणवादी व्यवस्था को जन्म देकर स्वयं उनके तारणहार भी बन बैठे। इस स्थिति ने एक ऐसे सामंतवादी व्यवस्था को जन्म दे दिया है जो हमारे देश की सारी आधुनिक व्यवस्थाओं को घुन की तरह खाए जा रहा है, जहाँ आमजन आज भी मात्र मूकदर्शक बना हुआ है। हमारी इस सांस्कृतिक कमजोरी ने ही देश को सैकड़ों वर्षों की गुलामी में ढकेलते हुए बाहरी लोगों को इस देश पर शासन करने का अवसर प्रदान किया। यही मानसिकता आज माफियावाद का रूप ले चुकी है जहाँ इसके विभिन्न रूप दिखाई पड़ रहे हैं, यह भारतीय संविधान में प्रस्तावित नागरिकों में समानता के उद्देश्य को खोखला सिद्ध कर रहा है। 
             हमारा देश आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का सबसे बड़ा प्रहरी दिखाई देता है, तथा गर्व से विश्व मंच पर हम अपनी इस व्यवस्था का उल्लेख भी करते हैं, लेकिन आम-जन की भागीदारी इस व्यवस्था में कहाँ तक है? वास्तव में देखा जाए तो सामंतवादी मानसिकता के गढ़ों ने जनता का उनके अधिकारों के साथ व्यपहरण कर लिया हैं और इस लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता का उपयोग मात्र सरकार बदलने तक सीमित कर दिया है शासक के रूप में वही लोग, वही नीतियाँ, इनमें कोई खास बदलाव नहीं आ पाया है इतने वर्षों के बाद भी हमारे यहाँ प्राचीन सामाजिक, आर्थिक असमानता आज भी व्याप्त है तथा जब-तब विषैले साँपों की तरह धार्मिक-जातीय दुराग्रह राष्ट्र की एकता पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर देते हैंविचारणीय है कि इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का आखिर उद्देश्य क्या है? ऐसा प्रतीत होता है कि इसका उद्देश्य केवल सरकार बदलने तक सीमित हो गया है जो प्राचीन एवं मध्यकालीन शासकों के हिंसक और पैत्रिक सत्ता संघर्ष को एक लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार भर प्रदान करता हैं तथा इसे सत्ता प्राप्त करने की सीढी मात्र समझा गया हैगांवों में मानव विकास की पांच हजार वर्ष पुरानी सभ्यता का दर्शन आज भी हो जाता है जिसके लिए किसी किताबी अध्ययन की आवश्यकता नहीं होगी। एक विकासशील राष्ट्र से विकसित राष्ट्र बनने का चाहे जितना ढिढोरा पीटें पर एक राष्ट्र-राज्य का मानक भी हम नहीं गढ़ पाए हैं जिस पर चल कर कोई भी देश अपनी ऊँचाइयों पर पहुँच सकता है। 
         हमारी आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना रागही दिखाई देता है। आखिर हमारी इस आधुनिक व्यवस्था की यह दुर्दशा क्यों है?  चुनाव और बहुमत के खेल में ही यह क्यों उलझ कर रह गया हैइसे समझने के लिए मानव मन की महत्वाकांक्षा को समझना होगा। इसके लिए हम अपने उस ‘मानसिक तत्व’ को उत्तरदायी मान सकते हैं जो समाज में मानसिक विभाजन को पुष्ट करता चला गया है। इसके क्रम में हमें अन्य धार्मिक देनों को भी समझना होगा जैसे मानव सदैव से महत्वाकांक्षी रहा है और उसकी इस इच्छा की पूर्ति के चार माध्यम रहे हैं जिन्हें चार पुरुषार्थ की संज्ञा भी दी गई है-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। पूर्व में धर्म और मोक्ष के भाव की प्रधानता थी क्योंकि प्रकृति पर मानव की निर्भरता अधिक थी और तब यही शक्ति का आधार थी आज अर्थ और काम की प्रबलता है क्योंकि आधुनिक मानव भौतिक व्यवस्थावों को अपने अनुकूल बनाता जा रहा है जिससे उसमें उपभोग की लालसा जागृत हो रही है। यहाँ अर्थ और काम को उसके शाब्दिक अर्थों में ही नहीं बल्कि इसे व्यापक सन्दर्भों में ग्रहण करना होगा जहां इसे शक्ति के अर्जन तथा इसके उपभोग के सन्दर्भ में देखना होगा और इन सब के केन्द्र में हमारे औरों से श्रेष्ठ होते जाने का भाव छिपा है। यह दूसरों से श्रेष्ठ होते जाने का भाव मात्र अर्थ और काम की परिधि तक ही सीमित हो चुका है। मोक्ष तथा पुरुषार्थ को निर्बल-वर्ग के लिए सुरक्षित रखते हुए इसे सीढ़ी के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है जो सामंतवादी मानसिकता को ही अभिव्यक्त करता है, इसी भाव को शासन व्यवस्था में भी ग्रहण कर लिया गया है। शक्ति अर्जन करने की जो सामंतीय प्रवृत्ति लोगों को जातीय समूहों में बाँटकर प्राचीन युग से चली थी अब इस प्रवृत्ति से अर्जित शक्तियों में विभाजन होने लगा है। भारतीय समाज में शक्ति के आकांक्षी चालाक वर्ग ने ऊपर वाले पर विश्वास कर सहज जीवन जीने वाले जन-मन की भावनाओं का अपने हित में दुरूपयोग करना प्रारम्भ कर दिया। यहाँ सामंतीय वृत्तियों को संस्कार-वश निर्मित ‘मानसिक तत्व’ से आधुनिक समाज के विभिन्न स्तरों को भी प्रभावित करने में सहायता मिलने लगी। 
            अब शक्तियों के बटवारे का खेल आधुनिक तरीके से खेला जाने लगा है। कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका शक्तियों के बटवारे के आधुनिक युग के माध्यम बन चुके हैं। यह तीनो माध्यम अपनी उर्जा लोकतंत्र नामक प्रक्रिया से प्राप्त कर रहे हैं; इस प्रक्रिया के प्रथम सोपान वही आम-जन है जिसने प्राचीन दार्शनिक-धार्मिक और सामाजिक-आर्थिक संस्कारों वश अपनी दुरावस्थाओं को अपनी नियति मानकर किसी तारणहार को सहज रूप से स्वीकार कर लेता है तथा अपनी दुरवस्थाओं के विरुद्ध खड़े होने का साहस नहीं दिखा पाता। शक्तियों के बटवारे के इस खेल में उसे इसका क्षणिक हिस्सा ही मिला है जिसका उपयोग भी वह कभी कभार ही कर सकता है। ऐसी मन:स्थिति और और इस खेल का क्या परिणाम हो सकता है इसे शक्तियों के बटवारे के तीनों आधुनिक माध्यमों में व्याप्त विकृतियों में देखा जा सकता है।
          भारतीय जनमानस में सामंतवादी मानसिकता का प्रभाव इसकी आधुनिक संस्थाओं में स्पष्ट दिखाई देता है। शासन व्यवस्था के सभी अंगों में श्रेष्ठता अर्जित करने का भाव जैसे सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया गया है; यहाँ दायित्व का स्थान गौण हो चुका है, व्यक्ति को उसके कार्य से नहीं बल्कि धारित-पद और उससे अर्जित शक्तियों के आधार पर महत्व मिल रहा है, यह प्रवृत्ति शासन के तीनों अंगों विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका में भी दिखाई देता है। हमारी इस व्यवस्था में पद धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकार एवं शक्तियों को एक दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने में ही समय और उर्जा नष्ट करता रहता है; परिणाम स्वरूप अपनी इस महत्वाकांक्षा के कारण वह अपने दायित्वों से दूर होता चला जाता हैं। इस प्रवृत्ति के कारण सही बात या उचित तथ्यों को आगे बढ़ाने की क्षमता घटती चली जाती है और भ्रष्ट आचरण की शुरुआत भी यहीं से होता है। इस मानसिकता से प्रभावित होने के कारण प्रशासकीय गुणों के लिए अनिवार्य निर्वैयक्तिकता जैसा महत्वपूर्ण गुण तिरोहित हो जाता है जिसके कारण ऐसी प्रशासकीय प्रणाली में आम-जन कार्यपालिका-जनित न्याय से वंचित हो जाता है। वास्तव में भारतीय नौकरशाही में इस सामंतवादी सोच के ‘मानसिक तत्व’ को स्पष्ट रूप से खोजा जा सकता है।
            हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली के महत्वपूर्ण अंग राजनीतिक दलों में परिवारवाद, राजनैतिक नेताओं के अपने-अपने चुनावी गढ़ इसी तथ्य को रेखांकित करते हैं जहाँ का ताना-बाना हमारी सांस्कृतिकजन्य बेचारगी से शक्ति प्राप्त करता रहता है और जो धीरे-धीरे एक लोकतांत्रिक सामंतवादी ढाँचा विकसित कर लेता है। सबसे छोटी इकाई ग्रामपंचायत जैसी संस्था से लेकर संसदीय व्यवस्था तक में इसी 'मैं और बाकी सब मेरे लिए' की मानसिकता दिखाई देती है। यही नहीं हमारी तमाम सामाजिक धार्मिक सस्थाएं इसके जीते जागते प्रमाण हैं जहाँ देश की सीधी-साधी जनता को भ्रमित करते हुए ऊँचे पायदान पर बैठे लोग शक्ति-अर्जन और इसके बँटवारे का खेल गुपचुप खेलते रहते हैं। इस तरह हमारी सारी आधुनिक व्यवस्थाएं जैसे शक्तियों के विभाजन के खेल में ही उलझी हुई हैं और हम अपनी आत्मार्पित और अधिनियमित व्यवस्थाओं से आज तक मात्र सरकारें बदलना ही सीख पाएं हैं समाज बदलना नहीं।
            वास्तव में सरकारों से हम समाज बदलने की अपेक्षा कर भी नहीं सकते और यदि सरकारें इसकी कोशिश भी करती हैं तो इसकी प्रकृया बहुत धीमी होती है, जो मात्र शक्ति अर्जित कर किसी तरह सत्ता में बने रहने तक सीमित हो जाती है। इसे हम उसी तरह से देख सकते हैं जैसे एक सामन्तवादी मानसिकता का व्यक्ति येन-केन प्रकारेण समाज पर अपनी उपादेयता स्थापित कर समाज को बरगलाते हुए उससे अर्जित शक्तियों का अपने हित में लगातार दुरूपयोग करता रहता है। आज की लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से उपजे तथाकथित जनप्रतिनिधियों में यह प्रवृत्ति विशेष रूप से देखी जा सकती है। यह एक प्रकार से लोकतान्त्रिक व्यवस्था का सामन्तीकरण है, जिसका एक पूरा चक्र है। इस चक्र की एक खास विशेषता है जिसमें एक व्यवस्था दूसरी व्यवस्था को निष्प्रभावी बनाते हुए ही आगे बढ़ती है।