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मंगलवार, 22 अगस्त 2017

मेरी बस-यात्रा

         मुझे लगता है सरकारी बस सेवा मने रोडवेज बस पर चलना सुरक्षा और आर्थिक लिहाज से यात्रा का एक बेहतरीन विकल्प है। वैसे भी आजकल धीरे-धीरे सड़कों की स्थिति, खासकर प्रमुख शहरों को जोड़ने वाले मार्गों की दशा सुधरी है, मतलब फोरलेन या टू-लेन में परिवर्तित होते हुए स्मूथ टाइप का बन रहे हैं, यानी अब, चाहे बस की पिछली सीट पर ही क्यों न बैठें हों, आपको धचके नहीं लगेंगे। खैर.. 

       इधर मैं बस-यात्रा के गुण गा रहा हूँ तो, वहीं इधर थोड़ा समय बचाने के चक्कर में बस-यात्रा वाली अपनी बात के उलट मैं दो-सवा दो सौ किमी की अपने कार्यस्थल की दूरी अकसर अपनी कार से, स्वयं ड्राइव करते हुए तय करने लगा हूँ। वैसे भी, मैं अपनी दो हजार चार माडल की जेन कार से बहुत प्रेम करता हूँ...क्योंकि अभी तक इस बेचारी मेरी कार ने मेरी ड्राइविंग की गलतियों का खामियाजा स्वयं अपने ऊपर भुगता है और हम पर आँच नहीं आने दिया है! भाई! इसीलिए तो हम कण-कण को चेतन मानते हैं... 

         हाँ तो, उस दिन मैं अपनी कार से नहीं था.. आधी दूर अपनी "वो वाली गाड़ी" से और शेष आधी यात्रा बस से तय किया था...बस कानपुर पहुँची रात के लगभग दस बज चुके थे...बस-अड्डे वाले रास्ते पर बस मुड़ते देख, मैं अपनी सीट से उठकर कंडक्टर के पास पहुँचा और कंडक्टर से पूँछा था, "क्यों कंडक्टर साहब..अगर यहाँ उतर जाएँ तो, यहाँ से इस समय लखनऊ वाली बस मिल जाएगी या नहीं?"  बस-अड्डे तक न जाकर समय बचाने के लिए उधर से लखनऊ जाती बस को वहीं मोड़ पर पकड़ने का इरादा लिए मैंने बोला था। एक क्षण कंडक्टर ने मेरी ओर देखा और बोला, "नहीं साहब, इस समय इधर से बस नहीं गुजरेगी..झकरकट्टी से ही पकड़ लीजिए.. अब टाइम ज्यादा हो गया है।" मैंने कंडक्टर की बात मानी और उसके बगल में उसी की सीट पर बैठ गया था। 

         रास्ते पर पड़ने वाले चौराहों पर बस रूकती और यात्री उतर जाते...खाली होती बस देखकर जब कंडक्टर से मैंने पूँछा कि बस के लिए सवारी मिल जाती है या नहीं तो, कंडक्टर ने बताया था, "हाँ, मिल जाती हैं, बस-अड्डे पर तो नहीं लेकिन रास्ते में काम भर की सवारी हो जाती है, यहाँ बस-अड्डे पर सवारी का इन्तजार करते ही रह जाते हैं.. दूसरे दबंग कंडक्टर मेरी बस के आगे अपनी बस लगा कर सवारियों को अपने बस में बैठाने लगते हैं.. साहब, हम ठहरे सीधे आदमी, बोले तो झगड़ा कर बैठते हैं और गरियाने लगते हैं...इसीलिए बोलता नहीं, बस भगवान् भरोसे रहते हैं..रास्ते में बस को रोककर सवारी लेते हैं।"

          कंडक्टर की सिधाई भरी मायूसी देखकर मैंने कहा, "हाँ, सरकार को भी चाहिए की बसों के चलने के बीच टाइमिंग फिक्स करे... एक ही रूट पर एक साथ दो-दो, तीन-तीन बसें निकलने लगती हैं, कम से कम इनके चलने के बीच पन्द्रह मिनट का अंतराल फिक्स कर देना चाहिए।" "लेकिन साहब इसपर तो कोई ध्यान ही नहीं देता.."इस बात पर मैंने कहा, "हाँ, यह तो ध्यान न देने वाली बात सब जगह है.. लोग अपने मतलब की बात पर ही ध्यान देते हैं।" कंडक्टर को मेरी इस बात पर आत्मीय दृष्टिकोण की झलक मिली तो वह कह बैठा, "साहब,  हमी लोगों की हालत देखिए हम संविदा पर हैं..हमें एक रूपया छब्बीस पैसा प्रति किलोमीटर के हिसाब से दिया जाता है..।" मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखते हुए पूँछा, "महीने में कुल कितना मिल जाता होगा?" "अरे साहब यही कोई सात-आठ हजार के आसपास, इसी में बच्चों को पढ़ाना और किसी तरह परिवार का गुजारा करना होता है..!" मैंने अब उसकी ओर दया भाव से देखा था, इसके सिवा और कर भी क्या सकता था। 

       अपने प्रति मेरा दयाभाव भांप कंडक्टर ने मुझसे पूँछा, "साहब आप क्या करते हैं?" मैं बताना नहीं चाहता था और टालने की गरज से बोला था, "अरे कुछ नहीं बस हम भी ऐसे ही नौकरी करते हैं।" कई बार उसके कुरेदने पर बताना पड़ा। फिर वह बोला था, "साहब, आपके आफिस आकर आपसे मिलेंगे, भूलिएगा नहीं.."  मैंने उसे आश्वस्त किया। तभी, लखनऊ की ओर जाती जनरथ की ओर इशारा करते हुए उसने कहा, " साहब, यह लखनऊ जा रही है आप इसपर बैठ जाइए।" मैं उस संविदा वाले कंडक्टर के बारे में सोचते हुए जनरथ पर सवार हो चुका था। 

            वाकई!  जनरथ बस में बैठे-बैठे एसी की ठंडक में, मैं यही सोच रहा था इस देश की व्यवस्था सामान्यीकृत नहीं है.. व्यवस्थाएँ भी चीन्ह-चीन्ह कर चलती हैं। 

रविवार, 29 जनवरी 2017

हम एक दूसरे के लिए एक दूसरे का साथ दें

           उस दिन किसी टी. वी. समाचार चैनल पर प्रसारित हो रहे एक समाचार पर मेरा ध्यान चला गया था। किसी जिलास्तरीय न्यायालय ने पति-पत्नी के आपसी विवाद के बीच पत्नी के पास रह रहे दो छोटे-छोटे बच्चों को पति को सौंपने का निर्णय सुनाया था। इस निर्णय के क्रम में किसी तरह माँ से बच्चों को अलग किया गया था। टी.वी. चैनल, माँ से बच्चों को अलग करते हुए उस भाव पूर्ण दृश्य को ही बार-बार दिखा रहा था।
        इसके बाद इस चैनल के न्यूज-ऐंकर ने उनके आपसी पारिवारिक विवाद के बीच बच्चों के हित को लेकर माँ से प्रश्न करता है -
          "अगर आपके पति आपको फिर से अपने पास रखने के लिए तैयार हो जाएं तो क्या आप अपने बच्चों की खातिर इसके लिए तैयार होंगी?"
         महिला ने इसका उत्तर "हाँ" में दिया था।
         फिर ऐंकर ने उसके पति से पूँछा था -
        "आप, अपनी पत्नी को फिर से अपने पास रखोगे?" पति का उत्तर "न" में था। 
          
         इस "न्यूज" का यही विषय था।

         यहाँ पर उल्लेखनीय है, पति-पत्नी के इस झगड़े या उनके बीच बच्चों की छीना-झपटी जैसे भाव पूर्ण दृश्य के कारण मेरा ध्यान इस न्यूज पर नहीं गया था, और न ही इस समाचार के उल्लेख का उद्देश्य इस घटना के उचित-अनुचित पहलू तथा पति-पत्नी में से किसी एक को सही या गलत ठहराने सम्बन्धी किसी नैतिक निर्णय पर पहुँचने का है। 
       
        मेरा ध्यान न्यूज-ऐंकर द्वारा पति-पत्नी से पूँछे गए उस प्रश्न की शब्दावली पर चला गया था जो उसने पति-पत्नी के बीच के इस झगड़े को सुलझाने के लिए पूँछा था।

       पति-पत्नी दोनों से पूँछे गए इन प्रश्नों की शब्दावली में "रखने" और "रखोगे" शब्द आए हैं। बस मेरा ध्यान इन्हीं दो शब्दों पर अटक गया था। इस शब्द पर ध्यान जाते ही मैने अपनी पत्नी से मुस्कुराते हुए पूँछा था -
       "क्या मैं तुम्हें रखे हुए हूँ?"
       
        उनके उल्टे प्रश्न से मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। फिर मुझे उन्हें अपने प्रश्न पूँछने का कारण समझाना पड़ा तब जाकर जान छूटी।

         वास्तव में "रखना" जैसे शब्द का प्रयोग किसी निर्जीव से वस्तु या पदार्थ के लिए ही हो सकता है। या फिर एक मालिक होने के भावग्रस्त वाला व्यक्ति ही किसी नौकर को "रखता" होगा। जहाँ नौकर का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है, वह तो अपने मालिक के निर्देशों का गुलाम और "मालिक के लिए ही रखा" हुआ होता है। यहाँ मुझे एहसास हुआ कि किसी व्यक्ति के लिए "रखना" जैसे शब्द का प्रयोग उसकी मानवीय गरिमा के विरुद्ध है। किसी व्यक्ति के लिए प्रयोग किए गए इस शब्द में उस व्यक्ति की मानवीय गरिमा के साथ ही उसकी स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती परिलक्षित होती है और चाहे वह पत्नी ही क्यों न हो।
          विचारणीय है कि क्या इस "रखे" हुए भाव में आपसी प्रेम और समझ का भाव पैदा हो सकता है? क्योंकि कोई किसी को "रखे" या "रखने" में एक विलगाव जैसे संबंध का भाव छिपा होता है जो एक शक्तिशाली और एक निर्बल के बीच में ही हो सकता है।
         दुख है, एक समाचार ऐंकर मानवीय रिश्तों की गरिमा के विरुद्ध उसी शब्द; जिसमें निहित मानसिकता, जो ऐसे रिश्तों में दरार का कारण बनती है, को माध्यम बनाकर पति-पत्नी के टूटते उस रिश्ते के बीच में पुनः लाना चाहता था। उस ऐंकर द्वारा प्रयुक्त ये शब्द दरकते मानवीय रिश्तों के पीछे की मानसिकता और कारण को अनजाने में ही अभिव्यक्त कर रहे थे। 
            
         सच में हमारे शिक्षित समाज में भी अभी सोचने का नजरिया नहीं बदला है। हम शक्तिशाली और सक्षम है तो हमारे पास सब कुछ "रखा" हुआ है और यदि हम कमजोर तथा निर्बल हैं तो हम स्वयं किसी के यहाँ "रखे" हुए हैं! ऐसे में मानवीय गरिमा का कोई भी मूल्य नहीं रह जाता क्योंकि, तब व्यक्ति किसी के हाथों गिरवी ही "रखा" होता है।

         यहाँ नैतिकता, संविधान और कानून सब कहीं न कहीं इसी प्रकार से किसी न किसी के पास "रखे" हुए तो नहीं हैं? और लोग इनका "साथ" पाने से वंचित हो रहे हैं?
          ईश्वर करे हम एक दूसरे के लिए एक दूसरे का साथ दें।
          
                             ----- जय हिंद।
   

                               (26.1.16 के दिन की फेसबुक पर हमारी एक पोस्ट)

रविवार, 22 जनवरी 2017

हवा का सुरसुरापन

               स्टेडियम के सिमेंटेड पट्टी पर तेज कदमों से चलते हुए ग्रुपबाजों (पहले की #दिनचर्या में ग्रुपबाजों का परिचय दिया हुआ है) के बीच के आपसी वार्तालाप को सुनते हुए आगे निकल गया था...उनकी बात कोई खास तो नहीं थी लेकिन मेरा ध्यान उनकी बातों पर अवश्य चला गया... "घर में जब दो साथी लड़ने लगते हैं तो गुस्से मे सामानों को नुकसान पहुंचाने लगते हैं" यहाँ "साथी" का मतलब मैं नहीं समझ पाया था...लेकिन कुछ कामनसेंस लगा कर पति-पत्नी के बीच के विवाद को लगाया.... फिर उनकी बात सुनी "लेकिन सामानों को नुकसान पहुँचाना ठीक नहीं... आदमी कैसे-कैसे करके सामान बनाता है.." 
         इसी कड़ी में इनकी बात चल रही थी..."किस तरह हम दूर स्कूल कभी पैदल कभी साइकिल से जाकर पढ़े तब यहाँ पहुँचे हैं...तब बिजली भी नहीं होती थी...ढिबरी की रोशनी में पढ़े हैं...यहाँ तक कि लालटेन होना भी बड़ी बात होती थी...किसी-किसी घर अगर लालटेन होती भी थी तो एकाध ही...टार्च होना भी बड़ी बात होती...अब टार्च की जरूरत ही नहीं रह गई है...बच्चे कहते हैं टार्च की क्या जरूरत...."
             हाँ, आज बहुत दिनों बाद मैं साढ़े पांच बजे मैं स्टेडियम में टहलने पहुँचा था.. स्टेडियम में अँधेरा था...इधर महोबा में एक-दो दिन से ठंडी थोड़ी कम हुई है तभी स्टेडियम की ओर टहलने का मन किया था... वैसे भी महोबा में कुल मिलाकर छह-सात दिन ही तगड़ी ठंडी पड़ती है..अन्यथा जाड़े की धूप भी यहाँ कड़ी ही लगती है..स्टेडियम में टहलते हुए आज सुरसुरी हवा बह रही थी...यह हमारे पूर्वांचल जौनपुर या कहें लखनऊ की हिमालयी हवा जैसी हांड कंपाने वाली हवा नहीं होती ...कुल मिलाकर टहलते हुए यह हवा सुखद एहसास भर रही थी...स्टेडियम की उस सिमेंटेड पट्टी पर एक बेहद छोटा पिल्ला सिकुड़ा-सिकुड़ा सा कूँ-कूँ करता हुआ भागा जा रहा था...शायद उस पिल्ले को ठंड लग रही थी... उसकी माँ यानी कुतिया उससे काफी पीछे रह गई थी...मैंने झुककर उस पिल्ले को सहलाया और आगे बढ़ गया...कुछ दूर आगे जाने पर पीछे मुड़कर मैंने देखा तो वह पिल्ला जैसे मेरा पीछा करते हुए मेरे पीछे-पीछे चला आ रहा है...हलाँकि मेरी चाल तेज थी फिर वह मेरा पीछा नहीं कर पाया था...
           इधर ग्रुपबाजों की बातें सुनते हुए मैं उनसे आगे निकल आया था...उनकी बातें सुनकर मुझे याद आया....मैं भी बचपन में ढिबरी या लालटेन की रोशनी में पढ़ता था...मेरे पास एक लालटेन थी...शाम होते ही पहले उसका शीशा साफ करता था...कभी-कभी लालटेन की बाती यदि जली हुई होती तो जलते हुए लालटेन की बाती से धुँआ उठता और उसकी रोशनी भी तेज नहीं होती, तब उसकी बाती के जले भाग को काट कर फिर जलाता, अब लालटेन की उसी बाती से धुँआ रहित स्थिर लौ निकलने लगती और लालटेन की रोशनी भी तेज हो जाती....फिर लालटेन को अपने दालान के सामने टाँग देता...उसकी रोशनी देख मगन हो जाता...कभी-कभी हम-उम्र बच्चों के बीच लालटेन की रोशनी  को लेकर प्रतियोगिता भी हो जाती...मतलब मेरे लालटेन की रोशनी तुम्हारे लालटेन की रोशनी से तेज है टाइप का...
          वाकई, अब समय बहुत बदल गया है...ढिबरी और लालटेन का युग बहुत पीछे छूट गया है...तब का समय और परिस्थिति वैसी ही थी..आज के दौर में हो सकता है वही पुराना युग किन्हीं खास कारणों या परिस्थितियों वश कुछ खास लोगों या क्षेत्रों में देखने को मिल जाए लेकिन चीजें अब काफी हद तक बदल चुकी हैं..
             इस बदलाव में एक चीज बदलती हुई दिखाई नहीं देती, वह है... गरीब और गरीबी की बात करना..बल्कि आज भी यह उतनी ही शिद्दत के साथ राजनीति करने का हथियार बनी हुई है...यही नहीं, पेट्रोल खरीदते-खरीदते सात रूपए प्रति लीटर से सत्तर रूपए प्रति लीटर तक आ पहुँचा हूँ और आज हम एक बार में पहले से दस गुना ज्यादा पेट्रोल भरवाते हैं...लेकिन फिर भी हम गरीब की राजनीति के प्रति कुछ अधिक ही आकर्षित होते हैं...
          वैसे भी आजकल राजनीति की हवा बहुत तेज बह रही है..यह हमें और आपको अपने-अपने तरीके से आकर्षित करती है.. हम इस राजनीति के आकर्षण में खो जाते हैं.. आइए! राजनीति की हवा के सुरसुरे-पन का मजा लीजिए.. गरीबी-वरीबी तो आती-जाती रहती है..राजनीति में बहुत गर्मी होती है..चलिए हम राजनीति तापें... 

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

घोटाले बिन सब सून

            एक बार किसी कार्यालय के एक छोटे साहब ने बास से छुट्टी माँगने का अपना एक वाकया मुझे सुनाया। वे छुट्टी की अर्जी देने अपने बास के पास गए थे। तब उनके बास ने छुट्टी का उनका अपलीकेशन फेंकते हुए उनसे कहा था -
           "बडे़ आए छुट्टी लेने..! जेब में कुछ होगा तभी घर, परिवार रिश्तेदार भी पूँछेंगे..नहीं तो वहाँ कोई पूँछनेवाला भी नहीं मिलेगा..का करोगे छुट्टी लेकर..!" 
             बेचारे वे छोटे साहब, मन मसोसकर, अपना खाली जेब टटोलते बास के चैम्बर से बाहर निकल आए थे। बास ने छुट्टी का अपलीकेशन फेंका, छोटे साहब को इससे कहीं ज्यादा मलाल अपना खाली जेब टटोलकर हुआ रहा होगा। इसके बाद, छुट्टी लेने के प्रति उनके मन में उचाट पैदा हो गया। और इसी उचाट मन से सुदूर अंचल के अपने कार्यालय के वियावान परिसर में, जाड़े की एक रात, वे चौकीदार के साथ अलाव ताप रहे थे। वैसे भी, खाली जेब वाले वियावान में ही ठेले जाते हैं। इस पसरे वियावान के प्रभाव में, छोटे साहब के निपट अकेले मन को भाँपकर चौकीदार ने उनसे कहा -
             "अरे साहब! आप से पहले वाले जो साहब यहाँ थे उनकी तो कुछ पूँछिए ही मत, उनके रहने पर तो, इस समय भी ऐसे वियावान में मेला लगा रहता था..पर जब से आप आए हो, सब सून हो गया है..न कोई गाड़ी न कोई घोड़ा..न लोग..!"
              चौकीदार की बात से साहब को चोट पहुँची, मतलब, चौकीदार भी इस वियावान में उनसे, साथ देने की कीमत वसूलना चाहता है। ऐसे में, अलाव की गर्मी पर जेब की ठंडक भारी पड़ी और वे अलाव तापना छोड़ उसी परिसर स्थित अपने आवास में सोने चले गए। वाकई, जेब के ठंडकपने में अलाव-फलाव भी काम नहीं करता। 
                पता नहीं उन छोटे साहब ने अपने बास या चौकीदार से कुछ सीखा भी था या नहीं। लेकिन हमें तो उन छोटे साहब के बास की बात में दम नजर आता है, बास की बातें सोते हुए को जगाने वाली जैसी थी। ऐसा बास पथप्रदर्शक होता है, वह दुनियाँ में चलने की राह दिखाता है। ऐसे ज्ञानी शुभचिंतक बास से अपनत्व का भाव पैदा होना स्वाभाविक है और उनकी जगह मैं होता तो उस बास से अपनत्व स्थापित कर लेता। वहीं, उस चौकीदार का परसेप्शन भी कमाल का था। चौकीदार को यह समझ है कि चारा फेंकने वालों के लिए जंगल में भी मंगल होता है। उसे पता है, असली मजा चरिए और चराइए में है। मतलब, जहाँ चरने और चराने वाले होते हैं, वहीं जंगल में मंगल होता है। 

             वाकई, जेब में सूनापन तो जग में सूनापन और इस सूनेपन से कुछ-कुछ वैराग्य टाइप का मन हो आता है। जेब का खालीपन, मन पर इच्छाओं का भस्म लपेटकर व्यक्ति को वीतरागी बना देता है। लेकिन किसी समाजी का ऐसे वीतराग से काम नहीं चलता, उसे छुट्टी लेनी पड़ती है, घर,परिवार, समाज देखना होता है और इसके लिए जेब का जलवेदार होना जरूरी है। इस भवसागर में आनंदानुभूति जेब के जलवे के साथ ही उठाई जा सकती है और यह आनंदानुभूति घपले-घोटाले की वैतरणी में उतर कर ही प्राप्त की जा सकती है। वैतरणी के उस पार तो निपट सूनापन है, जबकि इस वैतरणी में बहकर सीधे भवसागर की आनंदानुभूति प्राप्त होती है और ऐसी वैतरणी में गोता लगाने वाले को यह जग, "खुले ख्यंम्भु दुआर" टाइप का जगमग-जगमग करने लगता है। फिर, छुट्टी क्या, यही बास बिन मांगे स्पेशल-लीव तक देने को तैयार खड़ा मिलता है, और तब पूँछनेवालों की तो पूँछिए ही मत..!"
              अब यह भी स्वयंसिद्ध अनुभव है कि जेब में माल बिना घपले-घोटाले के आ ही नहीं सकता। मतलब, जो घपले-घोटाले में लुल्ल उसका जेब सुन्न। घोटाले और जेब में चहल-पहल के बीच अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।  
             लेकिन मैं यहाँ थोड़ा कन्फ्यूज हूँ, वह कि, उन छोटे साहब को छुट्टी क्यों नहीं मिली..क्या वे घपले-घोटाले का मर्म नहीं समझ पाए थे? और अपनी बेवकूफी के कारण वियावान में अकेले ही झख मार रहे थे? मुझे लगता है उन छोटे साहब को वह अदना सा चौकीदार भी समझाने की ही कोशिश कर रहा था।
             वैसे जरूर उन छोटे साहब को घपले-घोटाले का मर्म पता नहीं रहा होगा या फिर घपले और घोटाले में किसी एक को चुनने के बीच उलझे रहे होंगे। अगर वे मुझसे सलाह लेते तो मैं उन्हें घपले करने की सलाह देता, क्योंकि घपले में, घपले करने की संभावना घपले कर लेने के बाद भी बना रहता है। वहीं, घोटाले करने में घपला करने की संभावना क्षीण होती है। यहाँ घोटाले को घपले से व्यापक माना जाना चाहिए। कई घपले मिलते हैं तब कोई एक घोटाला बनता है।

            ऐसे में, मैं उन छोटे साहब को यही सलाह देता कि भाई, छोटे टाइप के साहब को घपले में ही विश्वास रखना चाहिए। क्योंकि घोटाले करने का सर्वाधिकार बड़े किस्म के साहब के पास होता है। या फिर घोटाले के लिए बडे़ साहब से पूर्वानुमति प्राप्त होनी चाहिए। एक सफल घपलेबाज में बडे़ साहब के प्रेरणाभाव को पहचानने की समझ और क्षमता भी होनी चाहिए। मतलब, एक ओहदेदार को अपनी औकात के अनुसार एक-दूसरे का सम्मान करते हुए घपले-घोटालों को अंजाम देना चाहिए। वैसे भी किसी ओहदेदार के आसपास चहल-पहल उसके घोटाले कर लेने के औकातानुसार ही होती है। 
             अगर वे छोटे साहब इस पर भी न समझ पाते तो, मैं आखिर में, उन्हें यही समझाता कि घपला ही घोटाला है और घोटाला ही घपला है। छोटा साहब इन दोनों में से कुछ भी करे, लेकिन यदि बड़े साहब आँख तरेरें तो उसे दुलराहट के साथ बड़े साहब की थोड़ी लल्लोचप्पो कर लेनी चाहिए। फिर तो, बडे़ साहब इसे छोटे का उत्पात समझकर उस पर लाड़ बरसाना शुरु कर देंगे, जो रोजमर्रा का खेल हो जाता है। 

              वैसे भी अपने यहाँ एक मान्यता है कि "क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात"। फिर तो, छोटा घपला करे या घोटाला, बड़े के लिए यह उत्पात टाइप का ही होगा, और बड़ा भी अपनी शोभा की खातिर इसके लिए छोटों को क्षमा कर देता है।
          
             तो, छोटे साहब को हमारी यही सलाह होती कि चाहे घपला करो या घोटाला। इससे न डरो और न हिचको। घपला या घोटाला कोई कुछ कहे, बडे़ के सामने माना यह उत्पात ही जाएगा, और किसी छोटे द्वारा किया गया उत्पात क्षम्य माना जाता है, बशर्ते इस उत्पात से बड़े के जलवे में कोई खलल न पहुँचे। छोटा या बड़ा, इन ओहदेदारों के बीच घपले-घोटाले का खेल इनके बीच का आपसी लाड़-प्यार ही होता है। इसी लाड़-प्यार से इन ओहदेदारों का जीवन सदैव चहल-पहल से गुंजायमान रहता है।
              तो वियावान वाले छोटे साहब को मेरी अन्तिम सलाह यही होती कि लाड़-प्यार सीख कर जीवन में चहल-पहल हेतु घपले-घोटाले करने की क्षमता विकसित कर लेनी चाहिए। इससे जीवन का सूनापन, गधे के सिर से सींग जैसा गायब हो जाता है। और घोटाले कर लेने के बाद आत्मविश्वास इतना बढ़ जाता है कि वह एक सफल ओहदेदार बन, बैकबेंचर से फ्रंटलाइनर बन जाता है। आँख चुराने की तो दूर की बात अब उसमें बड़े साहबों की आँखों में आँख डालकर बात करने की हिम्मत भी आ जाती है और यह घपले-घोटाले का ही महात्म्य होता है। तभी किसी ने कह दिया है कि बिन घोटाला सब सून। 
              खैर अभी तक मेरी सलाह छोटे साहब के लिए ही थी। यहाँ बड़े साहब की भी यह चिन्ता हो सकती है कि उन्हें कौन क्षमा करेगा? इस पर मेरी बड़े साहबों के लिए यही सलाह है कि, यहाँ हर बड़ा अपने बड़े के सामने आटोमेटिक छोटा होता जाता है ; और ऐसी ही एक शृंखला बनती जाती है, चूँकि लोकतंत्र का जमाना है तो इस शृंखला में सबसे बड़ी यहाँ की जनता हुई, और इस प्रकार यह "क्षमाभाव" इसी शृंखला की सवारी करते हुए जनता तक पहुँच जाती है! और क्षमा की भरी पूरी गठरी इसी जनता के सिर-मत्थे जाकर अटकती है..! अब लोकतंत्र में जीनेवाली यह जनता स्वयं जनार्दन भी होती है इसलिए यह जनता किसी से क्षमापेक्षी नहीं होती। जनता भगवान भरोसे होती है।
          तो, छोटे और बड़े दोनों साहबानों को मेरी यही सलाह है "चिंता छाँड़ि अचिंन्त्य रहौ, सांई है समरत्थ" जनता जनार्दन सांई बन सबको आशीर्वाद देती रहती है। मतलब छोटे-बड़े के जलवे ही जलवे हैं और ये जलवे घपले-घोटाले के ही थ्रू है।
                                                  - Vinay 
                                                   (18.12.16)

        
      

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

निरहंकारी की संवेदना

           आज स्टेडियम की ओर जाते हुए सड़क के किनारे एक कुत्ते पर अचानक निगाह टिक गई थी..जो अपनी पिछली दो टाँगों और आगे की दोनों टाँगों के पंजों को जमीन पर टिकाए हुए अपनी आँखों को बंद किए हुए बैठा था..! सच में मैं देखता रहा गया था...एकदम से ध्यानमग्नावस्था में वह बैठा हुआ था...उस समय वहाँ दूर-दूर तक सन्नाटा पसरा हुआ था, हम जैसे सुबह-सुबह टहलने वाले बस इक्का-दुक्का लोग ही आ जा रहे थे..। उससे कुछ दूरी पर खम्भे पर जलते हुए एक लैम्प-पोस्ट की रोशनी जरूर आस-पास बिखर रही थी..इसी रोशनी में सड़क की ओर मुँह करके बैठने के उसके अंदाज से मैं उसकी ओर ध्यानाकर्षित हुआ था...। खैर... 
            स्टेडियम से वाकिंग कर वापस आया, चाय बनाने और पीने का कार्यक्रम चालू किया...इस बीच घर भी फोन लगाया...पूरी घंटी गई लेकिन फोन उठा नहीं..अपनी स्वयं की बनाई चाय मैं सुड़क रहा था कि घर से फोन आ गया...चाय सुड़कते हुए फोन पर बतियाने लगा...
                मैंने पूँछा, "का हो..! का, हो रहा है..?"
               "रोटी बना रही हूँ..." का हो की आवाज।
              "इतनी सुबह-सुबह रोटी बन रही है...?" मैंने जिज्ञासावश इसलिए पूँछा कि असल में इस समय घर पर कोई इतना छोटा बच्चा नहीं है कि स्कूल ले जाने के लिए उसका टिफिन तैयार किया जा रहा हो..!
            फिर उन्होंने बताया, "आज सुबह-सुबह जब गेट खोला तो कहीं से वह दौड़कर आ गया था...पहले उसे कुछ बिस्कुट दिए लेकिन उसे खाने के बाद भी वह वहीं बैठा रहा..फिर मजबूरन मुझे रोटी बनानी पड़ रही है..."
            असल में यह पालतू नहीं है, बस उसका जन्म हमारी गली में दो वर्ष पूर्व हुआ था...और यहीं वह बड़ा भी हुआ है ..एक बार इसी फेसबुक पर एक पोस्ट पर मैंने इसके बड़े भाई की कहानी पोस्ट की थी..एक दुर्घटना में वह चल बसा था...उसके बाद इसका लगाव हमारे घर से हो गया...अकसर भूँखा होने पर यह घर के गेट के बाहर आकर बैठ जाता है...और जब कुछ खाने को मिल जाता है तो फिर वापस चला जाता है....या कभी जब इसे आराम करने का मन होता है तो गेट खुला मिलने पर यह बेधड़क अन्दर आकर किसी किनारे या कार के नीचे कुकुर-कुंडली अवस्था में बिना किसी की परवाह किए पसर जाता है...
          इसी के बारे में एक दिन श्रीमती जी बता रहीं थी कि एक दिन गेट खोलने पर कहीं से जब यह दौड़ कर आया था...उस दिन उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया तो कुछ देर तक यह आस-मंडरा कर ध्यानाकर्षित करने का प्रयास कर झिड़की खा फिर यह वापस चला गया था...लेकिन फिर बाद में गेट खोलते समय इसने इनपर ध्यान ही नहीं दिया...बल्कि देखकर भी पास न आकर अनजान बन दूसरी ओर चला गया था...श्रीमती जी ने बताया था, तब उन्हें यह एहसास हुआ कि अपनी उपेक्षा के कारण यह नाराज हुआ है...इसके बाद उन्होंने जबर्दस्ती इसे अपने पास बुलाया..और रोटी- बिस्किट देकर जब मनाया तब यह सामान्य हुआ और इनसे खेलने लगा था..जैसे इसे भी अपनी गलती का एहसास हुआ हो...
         इस कुत्ते की इसी संवेदनशीलता को भाँपकर जब भी यह दिखाई पड़ता है इससे मुखातिब हो इसकी आवभगत करनी होती है...और सुबह या शाम गेट पर आने पर इसे रोटी देनी पड़ती है..किसी दिन यदि ऐसा न हो तो फिर स्वयं से यह दुबारा नहीं आता... इसकी इन भावनाओं का बहुत खयाल रखना पड़ता है....
          शायद, इसी वजह से सुबह-सुबह श्रीमती जी इस कुत्ते के लिए रोटी बना रहीं थी।
            भाई, लोग कुत्ते की इस कहानी को हँसी में मत टालिएगा...या इस पोस्ट को हँसी में मत लीजिएगा...हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि जब हम बहुत छोटे थे तो ऐसे ही जाड़े में गाँव में अलाव तापते खूब कुत्ते-बिल्ली की कहानी सुना करते थे....हाँ, बल्कि जब हमारे कुछ रिश्तेदार घर आते तो कुत्ते-बिल्ली की इन कहानियों को सुन हमें गँवार ठहरा कर हमें चिढ़ाते भी थे... लेकिन हम कभी नहीं चिढ़े... यदि चिढ़े होते तो मैं यहाँ आपको भी आज की यह कहानी सुनाने न बैठ जाता...सच तो यह है इन कहानियों को सुन सुनकर ही यहाँ इस फेसबुक पर कुछ ऐसी ही कहानियाँ सुनाने लायक हुआ हूँ...! 
         आज के अखबार के अन्तिम पृष्ठ पर एक समाचार हेडिंग "इतिहास के सबसे खतरनाक मोड़ पर मानवता" में स्टीफन हाँकिंग के हवाले से लिखा था "मानव समुदाय भयानक पर्यावरण संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा है।...मानवता अपने विकास क्रम में सबसे खतरनाक परिस्थितियों का सामना कर रहा है।" खैर...
           हम यहाँ यही कहना चाहते हैं....
           ...हम अपने अहंकार में दूसरों की संवेदनाओं की पहचान नहीं कर पाते..संवेदनशील होने और इसकी पहचान होने की योग्यता के लिए निरहंकारी होना अनिवार्य है...
                #दिनचर्या 
                --Vinay 
                 5/12/16

पुराने जमाने की एक कहानी

सोचता हूँ पुराने जमाने की एक कहानी आप को सुनाएँ...लेकिन जब आप ध्यान से सुने तब तो, आप ध्यान से सुन रहे हैं न..? तो लीजिए सुनिए....
                                        1
               तो बहुत पहले की बात है एक राजा था..(अरे भाई बहुत पहले एक राजा ही तो होता था) उसका राज्य काफी विशाल था..(तो राज्य क्या भारतवर्ष था?)..अरे भाई! पहले कहानी सुनो टोंको मत..! तो राजा को इतने बड़े राज्य पर राज करने में बहुत कठिनाई हुआ करती थी...(तो राजा होना क्या बच्चों का खेल है..?).. बीच में फिर बोले...! हाँ तो राजा को कठिनाई इस बात से होती कि उसके राज्य की प्रजा बहुत जल्दी किसी के बहकावे में बहक जाती..(गोया...राजा न होकर वह कोई पाँच साला जनता द्वारा चुनी सरकार का मुखिया रहा हो..कि जनता के नाराज हो जाने से कुर्सी जाने का खतरा हो..?) अरे भाई! कहानी पूरी हो तब कयास लगाएँ..! जनता के बहक जाने से उस राजा की कुर्सी जाने का खतरा रहता था। उस राज्य में राजा को कुर्सी पर विराजमान रहने के लिए समय-समय पर प्रजा से सहमति प्राप्त करना जरूरी होता...चूँकि जो राजा होता है वह खानदानी भी होता है...या वंशपरंपरा के प्रसादपर्यन्त राज करता रहता....तो वह राजा अकसर वंशपरंपरा के पुरखों का जबर्दस्त महिमामंडन अपने प्रजा के समक्ष करता करता रहता। प्रजा भी उस राजघराने के प्रति श्रद्धावनत रहती...अन्त में वर्ष दर वर्ष गुजरते रहे और राजा इतने बड़े राज्य पर आसानी से राज करता रहा...(आपकी कहानी झूठी है..इतने समय तक कोई राजा, राजघराने के प्रति प्रजा के श्रद्धाभाव के कारण राज कर सकता है..?) अरे भाई! पहले पूरी कहानी तो सुन लीजिए...!
           राजा अपने राज्य की जनता (जनता नहीं प्रजा..!हाँ..हाँ..वही..प्रजा..!) के लिए लुभावने काम करता....कहता.. हम तुम्हें भी अमीर बना देंगे...लेकिन होता यह...कि बीच के लोग सारा माल झटक लेते बेचारे गरीब तो गरीब ही रहते...खैर..राजकाज चलते-चलते ऐसे ही कई वर्ष बीत गए..गरीबों से गरीबी दूर होने के लिए तैयार ही नहीं हुई... 
          उस दिन राजा बहुत गुस्से में था...अपने दरबारियों से सीधे गरीबी को ही बुलावा लिया...साथ में यह ताकीद भी की, कि गरीबी खुद चलकर आए और गरीब के साथ न आए...हुआ यही, उस दिन राजा अपने दरबारियों के साथ राजसिंहासन पर विराजमान था...गरीबी...राजा के दरबार में बडे़ शान से हाजिर हुई थी...जैसे राजा का उसे कोई परवाह ही न हो...वैसे, गरीबी को यह पता होता है कि जब तक राजा है तब तक मैं भी हूँ...मतलब राजा होता है प्रजा से..और प्रजा होती है गरीबी से...सो गरीबी राजा के सामने पूरी निडरता से हाजिर हुई...!
            राजा तो राजा ठहरा और वह भी सिंहासन पर बैठा हुआ राजा.! उसने गर्व से दरबारियों के ऊपर इधर-उधर निगाह डाला..(हाँ, जैसे कहना चाहता है कि देखो, गरीबी हमारे वश में है) और फिर गरीबी के ऊपर उसकी निगाह टिकी,  गरीबी को देखते हुए राजा के मुखारबिंदु से एक रोबीली आवाज प्रस्फुटित हुई...  
             "क्यों रे गरीबी..! तुझे मेरी जरा भी परवाह नहीं...मैंने इतने जतन किए, फिर भी तूने मेरे राज्य का परित्याग नहीं किया...और मेरी प्रजा को अभी तक परेशान कर रखा है..?"
          गरीबी तो गरीबी उसका राजा क्या बिगाड़ लेगा..वह राजा की बातों को सुनकर मुस्कुराने लगी..! गरीबी की इस मुस्कुराहट पर राजा को थोड़ा गुस्सा आया...वैसे राजा का यह विशेष गुण होता है कि बिना उसकी इजाजत किसी अन्य की मुस्कुराहट उसे पसंद नहीं आती...सो राजा अपने सिंहासन पर बेचैनी से हिलते-डुलते चिल्लाहट भरी आवाज़ में गरीबी को देखते हुए चिल्लाया...
         "रे गरीबी..तू मेरी तौहीन कर रही है... मैंने कितनी बार देश तुझे देश निकाले की दंडात्मक राजाज्ञा पारित किया लेकिन तू मेरी नहीं सुनती..? और यहाँ मेरे दरबार में खड़ी होकर मुस्कुरा रही है...!"
        इतना कह राजा गुस्से से कांपने लगा था...जैसे पहली बार राजा गरीबी को देखकर गुस्से में आया था..! राजा के मन्त्रिपरिषद के लोग तो जैसे सन्नाटे में आ गए थे...इधर राजा के इस गुस्से को देख गरीबी को भी थोड़ी चिन्ता हुई...बात यह कि, इतने वर्षों से इस राजा के राज्य में रहते-रहते इस राजपरंपरा से उसका लगाव होना स्वाभाविक ही था...राजा की उसे लेकर बदली भावभंगिमा को देख गरीबी को जैसे एहसास हुआ कि अब यह राजा बेवकूफी पर उतरने वाला है...वह राजा को समझाने को हुई कि राजा की क्रोध भरी वाणी उसे फिर सुनाई पड़ी....
          "रे दुष्ट गरीबी..!मेरी राजाज्ञाओं की विरोधिणी..!! तूने एक राजा और उसके राज्य का अपमान किया है...और मेरी प्रजा को भी तूने प्रताड़ित करने का काम किया है.. मैं अपने इस पुत्रवत प्रजा की भलाई और अपने राज्य के सम्मान को बरकरार रखने के लिए तुझे फाँसी दिए जाने का हुक्म देता हूँ..." 
             राजा के इस हुक्म पर गरीबी सिहर सी गई थी...उसे आश्चर्य हो रहा था राजा ने इतना कठोर कदम कैसे उठा लिया...! उसने देखा उस राज्य के तमाम मीडियामैन धड़ाधड़ अपने फ्लैश कभी राजा के चेहरे पर चमकाते तो कभी गरीबी पर फोकस करते...इन सब के बीच गरीबी किंकर्तव्यविमूढ़ सी राजदरबार में खड़ी थी...उसे अपनी चिन्ता नहीं थी उसे चिन्ता थी तो केवल इस राजा और इसके राज्य की..! उसे समझ है..कि... बिना मेरे..! राजा और प्रजा का यह खेल भी खतम हो जाएगा..और... इधर प्रलय आने का भी कोई चांस दिखाई नहीं पड़ रहा था..सूरज महाराज वैसे ही धरती का चक्कर लगा-लगा कर सरदी-गरमी और रात-दिन करते जा रहे थे...फिर इस राजा की मति क्यों मारी गई कि अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने पर उतारू है...? 
        हाँ... राजा के भरे दरबार में तमाम जगमगाती फ्लेशलाईटों के बीच खड़ी गरीबी, राजा के फांसी वाले आदेश पर यही सोच रही थी...
          इधर राजा का हुक्म सुनते ही ले दरबारियों मन्त्रियों- संन्त्रियों सहित सभी गरीबी को धर दबोचने हेतु दरबार के वेल में पहुँच गए.. सभी अपने-अपने तईं गरीबी को दबोच लेना चाहते थे...और राजा की ओर देखते भी जा रहे थे....जैसे सब राजा की नजरों में गरीबी से इस फाइट में अपना नम्बर बढ़ते देखना चाह रहे हों.... सभी मिलकर गरीबी को कालकोठरी की ओर लेकर चलने लगे थे...राजा के चेहरे पर तनाव स्पष्ट रूप से झलक रहा था....राजा ने आज की सभा को यहीं मुल्तवी कर दी....
                        
                    इधर राज्य में चारों ओर, राजा द्वारा गरीबी को फांसी दिए जाने की चर्चा चल पड़ी थी...प्रजा का अपार समर्थन राजा के प्रति हो चुका था...अगले कुछ वर्षों तक वह निष्कंटक और राज कर सकता था....
                                   2
                  हाँ...उस दिन राजा अपने राजमहल में आराम फरमा रहा था...राज्याधीन खबरिया विभाग की रिपोर्टें भी पढ़ता जा रहा था... सब जगह राजा की जै-जैकार मची हुई थी...न जाने क्यों राजा करवट बदल मुँह विसूरते हुए सोने का प्रयास करने लगा था.... वैसे, राजा लोग होते तो समझदार ही हैं... नहीं तो राजा कैसे बनते..? गरीबी को फांसी सुनाकर राजा भी किसी न्यायाधीश की तरह अपना कलम तोड़ बैठा था...जैसे न चाहते हुए गरीबी को फांसी देनी पड़ी हो...और...यह सोचकर अपने पापबोध से परेशान हो उठा था...
                ...इसी बीच राजा के शयनकक्ष के दरवाजे पर ठक-ठक की आवाज हुई...कोई राजा से इसी वक्त मिलना चाहता था....राजा ने उस अपने खास व्यक्ति को शयनकक्ष में अाने की अनुमति प्रदान कर दी....शयनकक्ष में प्रवेश करते ही उस व्यक्ति ने राजा से कहा, 
         "हुजूर...! आपको हाईकमान ने याद किया है..अभी और इसी वक्त...!!" इसके बाद वह व्यक्ति मुड़कर गायब हो गया।
             राजा से भी बड़ा हाईकमान..! हाँ..राजा से भी बड़ा हाईकमान होता है..इस राज्य में..! (हाईकमान राज्य में प्रजा द्वारा स्वीकृत किसी वंशपरंम्परा टाइप रजघराने का मुखिया होता है...जिसे किसी विशेष परिस्थिति में कभी स्वयं राजा, तो कभी हाईकमान बन जाने का अधिकार प्राप्त होता है..प्रजा इस वंशपरंम्परा का बहुत आदर करती है )। तो, इस राज्य का यही सुपरनेचुरल हाईकमान, गरीबी को फांसी की सजा सुनाए जाने पर सक्रिय हो गया था...जिसकी सलाह के बिना राजा ने गरीबी को फाँसी की सजा सुनाई थी...राजा की इस चूक से हाईकमान के नाराज होने का खतरा उत्पन्न हो गया था..और राजा को यह बात पता थी कि हाईकमान के विश्वासपर्यन्त तक ही वह राजा बना रह सकता है...वह झटपट शयनकक्ष से निकल कर हाईकमान की ओर चल पड़ा...
             हाईकमान का दरबार सजा हुआ था....स्वयं हाईकमान सबसे ऊँचे आसन पर आरूढ़ था...राजा के सारे दरबारी और मन्त्रीगण वहाँ अपनी महत्तानुसार हाईकमान के आसपास ऊँचे-ऊँचे आसन पर विराजमान थे...हाईकमान के इस दरबार में राज्य के कोने-कोने से आए कुछ चुनिन्दा किस्म के कारिंदे टाइप लोग भी नीचे आसन पर जमे हुए थे....इधर गरीबी भी इस सजीले दरबार में अपनी पूरी सजधज के साथ आ कर खड़ी थी...राज्य के कुछ महत्वपूर्ण संन्त्री उसके लिए सुरक्षा का घेरा बनाए हुए खड़े थे.....
             राजा ने इस दृश्य को देखा... इस दरबारी दृश्य को देखकर वह भौंचक था..! उसे अपनी आँखों पर जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था...कि...अभी जिस गरीबी को उसने फांसी की सजा सुनाई थी...वही गरीबी....राज्य के संन्त्रियों के सुरक्षा घेरे में हाईकमान के समक्ष यों खड़ी मिलेगी..? राजा अपनी आँखें मलमलकर इस दृश्य को देखने लगा था...
            भौंचक राजा हाईकमान के समक्ष आकर खड़ा हो गया...इस दरबार में राजा को बैठने के लिए आसन भी नहीं उपलब्ध कराया गया...जैसे राजा के हाथों कोई बहुत बड़ा गुनाह हुआ हो और राजा हाथ बाँधे हाईकमान के समक्ष काटो तो खून नहीं जैसी हालत में खड़ा था...उसने देखा, जो दरबारी राजदरबार में बिना उसकी आज्ञा आसन नहीं ग्रहण करते थे वही, यहाँ इस दरबार में बिना उसकी परवाह किए आसन पर बैठे हैं...? 
             खैर....राजा की तंन्द्रा टूट चुकी थी हाईकमान की कड़कती आवाज सुनकर..! राजा ने हाईकमान के आग्नेय हो चुके नेत्रों की ओर देखा...और उनके सम्बोधन को इस दरबार में खड़े-खड़े ही सुनने लगा.....वाकई!  यह आश्चर्य की ही बात थी कि इतने महान राज्य का राजा यहाँ इतनी निरीहता से खड़ा था...!!

             हाईकमान की यह आवाज राजा के कानों में गूँजी...
             "तुम्हें पता है राजा होने के मायने..? मैंने तुम्हें राजा, राजमद में चूर होने के लिए नहीं बनाया था...कि...तुम अपने राजमद में गरीबी को ही फाँसी देते फिरो..? अरे बेवकूफ..! यहाँ तो राजा बनने वालों की तो लाइन लगी है..लेकिन मैंने सोच समझकर तुम्हें राजपद दिया था..कि...तुम सीधे-सज्जन और ज्ञानी तथा कम बोलने वाले हो...हमारी भावी पीढ़ी के योग्य होने तक राजकाज सुरक्षित चला लोगे...!
         ..... लेकिन तुम किसी राजा और उसके लिए प्रजा होने की महत्ता भूल गए...तुम्हें पता है..! जब प्रजा ही नहीं होगी तो राजदरबार किसके लिए सजाओगे...और फिर मेरी काहे की हाईकमानी...? यह दरबार और दरबारी...मन्त्री..संन्त्री..और...मेरे दूर-दराज तक के कारिंदों की शान...सब इस बेचारी गरीबी के ही कारण है...! जब तक गरीबी है हम सब हैं...और हमारा राज है...समझे..!"
           हाईकमान के सामने हाथ बाँधे खडे़-खड़े राजा ने बड़ी ही बेचारगी के अंदाज में संन्त्रियों की सुरक्षा में इठलाती..मुस्कुराती खड़ी गरीबी की ओर निहारा....राजा उसे देख एकबारगी तो फिर चिढ़े लेकिन अगले ही पल चिहुँक कर गरीबी को देख मुस्कुराने लगे..जैसे, अपने साहब को देख न चाहते हुए भी कोई मातहत मुस्कुराने लगता है...वाकई! ये मुस्कुराहटें भी न, होती हैं बड़ी लाजवाब ही..! इधर दरबारियों के चेहरे मुस्कुराहटों से खिल उठे थे।
         अचानक हाईकमान की आवाज फिर गूँजी....
         "सुनो राजाधिराज जी...! जाओ गरीबी को फांसी देनेवाली अपनी राजाज्ञा वापस लो....और....गरीबी को स्वतंत्र करो...जिससे ..मेरे ये कारिंदे, दरबारी, मन्त्री, संन्त्री सब मिलकर गरीबी दूर कर सकें और इन्हें भी गरीबी दूर करने का श्रेय मिलना चाहिए...आखिर..जब सब मिलकर गरीबी दूर करेंगे तभी गरीबी दूर होगी...गरीबी दूर करने का अधिकार सभी को है...मैंने तुम्हें राजा बना कर भूल की है...तुम्हें राजनियमों की इत्ती भर जानकारी नहीं...?  राजा को कभी श्रेय लेने के लिए कार्य नहीं करना चाहिए....तुम्हें श्रेय देने का सर्वाधिकार हमारे पास सुरक्षित है...!"
         हाईकमान ने जैसे ही अपनी वाणी को विराम दिया..तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा सभाकक्ष गूँज उठा...सभी दरबारी वाह..वाह..कर उठे...इधर राजा अपना थूँक निगलते हुए मिमियाती सी आवाज में हाईकमान से बोले...
            "जी...जी...पर...सर..सर.., लोग कहेंगे कि गरीबी को हमने बचाया है...इसमें प्रजा के नाराज होने का खतरा भी है...इससे भी हम-आप असुरक्षित हो चुके होंगे...वैसे भी...आजकल..गरीबी के विरोध में तमाम दवाब समूह उभर आए हैं...क्रान्ति संभावित...सी..!"
             राजा की बात से दरबार में थोड़ी देर के लिए सन्नाटा पसर गया..फिर दरबारियों में ही आपस में गुफ्तगू होने लगी...अचानक हाईकमान का स्वर फिर उभरा....
           "देखो...अब तक हमारी वंशपरंपरा से ही राजा बनते आए हैं...और सभी ने गरीबी हटाने के लिए काम किए लेकिन, इनमें से किसी ने भी गरीबी को फांसी पर नहीं चढ़ाया...यह गरीबी प्रजा के सानिध्य में और उनके पास ही रहती है...और प्रजा जब-तब गरीबी हटाए जाने का सुख भोगती रहती है...हमारे गरीबी हटाने के प्रयास को देखकर ही प्रजा हमको ही राजा मानते आई है...इस बात को तुम्हें समझना चाहिए...और...रही बात क्रान्ति की तो..! तो हमने प्रजा को तमाम अधिकार दिए तो हैं..वह काहे नहीं अपने इन अधिकारों का प्रयोग करती..? सूचनाधिकार से प्रजा स्वयं अपनी गरीबी हटा सकती है...इतने अधिकार सम्पन्न होने के बाद हमारे राज्य की प्रजा कभी क्रान्ति नहीं कर सकती ..!"
           राजा हाथ बाँधे हुए हाईकमान की बात गौर से सुन रहा था ...लेकिन सभा बीच इठलाती गरीबी को देखते हुए बीच में बोल पड़े...
             "लेकिन सर जी...गरीबी न हटने से प्रजा के नाराज हो जाने का खतरा है...और वैसे भी राज्य में आपके तमाम विरोधी प्रजा के कान भरने शुरू कर दिए हैं... प्रजा के कान भरने वालों के खिलाफ हम कार्यवाही भी नहीं कर सकते...आपके विरोधियों का यह रामलीला मंचन नाटकीय होते-होते धार्मिक रूप ग्रहण करता जा रहा है...प्रजा दिग्भ्रमित सी हो जाती है...!"
          राजा की बातों को हाईकमान ने ध्यान से सुना और धीर-गंभीर आवाज में कहा,
           "राजन...(हाईकमान द्वारा यह" राजन" कुछ-कुछ "मोरे रजऊ" जैसा सम्बोधन लिए था) मैंने तो केवल गरीबी को फाँसी चढ़ाए जाने पर मना किया है...गरीबी दूर करने के प्रयास पर नहीं..! जाओ जाकर अपने अमले के साथ गरीबी दूर करने के अपने प्रयास को अपनी प्रजा को खूब दिखाओ...इसके लिए अपनी प्रतिबद्धता को बार-बार दुहराओ और कहो कि जो गरीबी दूर करने में अवरोध खड़ा करेगा उसके विरुद्ध कठोर से कठोर कार्रवाई होगी...सतर्कता कमेटियों का गठन करो...सतर्कता आयुक्त बनाओ...अपने अमले को इसके अधिकार क्षेत्र में खड़ा करते हुए प्रजा को दिखाओ ..गरीबी दूर करने में किसके स्तर से किस स्तर की कोताही की गई थी...इसकी जाँच कराओ...मेरा तो यह भी आदेश है कि राजा स्वयं को भी इस जाँचाधिकार में सम्मिलित करे...देखना...! यह तुम्हारी जो प्रजा है न, तुम्हारे गरीबी दूर करने की इस मुहिम से जबर्दस्त खुश हो जाएगी...!! आखिर, जनता को कुछ होते हुए दिखाई पड़ जाएगा...! फिर समवेत रूप से सबकी गरीबी दूर होगी..जनता खुश होगी...जैसे मोगैम्बो खुश हुआ था..और हाँ..प्रजा के साथ-साथ कुछ अपनी भी चिन्ता किया करो.."
               राजा....हाँ..हूँ के अन्दाज में हाईकमान की बात सुनता रहा...उसने उड़ती हुई सी निगाह हाईकमान पर डाली...हाईकमान से कुछ लोग अपने को सतर्कता आयुक्त बनाए जाने की सिफारिश भी करते दिखाई देने लगे थे..खासकर अभी तक पदविहीन रहे कारिंदों की इसके लिए लाईन सी लग गई ..कई कारिंदों ने तो इसी चक्कर में राजा को भी धकिया दिया...हर स्तर की तमाम सतर्कता आयोगों, कमेटियों में पद लेने की होड़ सी मच उठी थी..हाईकमान और समृद्ध हो उठा था...
         ..... इधर....गरीबी की ओर से सबका ध्यान भंग हो चुका था...गरीबी को जैसे ही अपनी इस आजादी का बोध हुआ वह भी अपने लिए सर्वाधिक सम्मानित स्थल प्रजा-निवास की ओर चुपके से निकल पड़ी...
            इस राज्य का यह राजा अब चुपचाप अकेले ही हाईकमान के दरबार से बाहर अपने राजमहल की ओर चल पड़े... उन्हें जाकर तुरन्त बिस्तर पर पड़ जाना था...सोना था...लेकिन रास्ते में तमाम मीडिया मैन उनके मुँह पर अपने-अपने माइक लगाए बस एक ही प्रश्न दोहरा रहे थे...
             "तो महाराज...! गरीबी को फाँसी पर चढ़ाने के लिए कौन सी तिथि निर्धारित की गई है..?"
             राजा मौन इस प्रश्न की अनसुनी करते हुए अपने शयनकक्ष की ओर अपने डग अब और तेजी से बढ़ाने लगा था....
     (.....यह कहानी थी पुराने जमाने के एक राजा की...आगे अवसर मिला तो इसी राज्य की आगे की कथा सुनाएंगे...)
                       --Vinay 
                         4/12/16     

        
          
         
       

बेखुदी में सनम

        "बेखुदी में सनम..उठ गए जो कदम..आ गए...आ गए..आ गए पास हम.."
         आज सुबह जब अपने आवास से निकल सड़क पर आया तो सुबह-सुबह सवारी की तलाश में खड़े अाटो के बड़े भाई टैम्पो में यही गाना बज रहा था। गाना सुनते हुए मैं अपने कदम स्टेडियम की ओर बढ़ाते गया...
             गाने को सुनते हुए और चलते-चलते मैं मानसिक मंथन में भी निमग्न हो गया था...मुझे लगा यह "बेखुदी" कैसी होती होगी..काम की होती है या बेकाम की..? गाने की मधुरता से एहसास हो रहा था कि यह बेखुदी होती है बडे़ काम की..! आखिर! इस बेखुदी में ही तो कदम उठते हैं...कदम बढ़ते हैं...लोग पास आ आते हैं...
        वाकई! "बेखुदी में" होना एक इतिहासकारी घटना होती है...या कभी यही बेखुदी क्रांतिकारी सी हो जाती है...यह आमने-सामने, मतलब बेखुदी में होने के खिलाफ वाली बेखुदी भी होती है...बेखुदी में इंसान क्या से क्या बन जाता है...!! 
        सोचिए!  क्या कभी आप "बेखुदी में" हुए हैं..? अगर हुए होंगे तो निश्चित ही कदम बढ़ाए होंगे..और नहीं हुए होंगे तो केवल हाथ मलते रह गए होंगे.. फिर तो आप में जड़ता रही होगी...
          "बेखुदी में" को हम किस बात की निशानी मानें? बेवकूफी की या फिर बुद्धिमानी की? इसका उत्तर देना मेरे बस में नहीं..क्योंकि बेखुदी में होने पर तमाम तरह के लफड़े भी शुरू हो जाते हैं...जैसे इन्हीं लफड़ों के कारण लोग बेखुदी में होने को बेवकूफी की निशानी मानते हैं..कभी-कभी तो बेखुदी की तुलना हराकिरी से भी किया जाने लगता हैं...एक चीज तो मैं भी मानता हूँ अकसर बेखुदी में उठे शुरुआती कदम को लोग बेवकूफी ही मानते हैं....लेकिन तमाम लफड़ों के साथ पड़ते बेखुदी के ये कदम कब लोगों को एक दूसरे के पास ले आता है इसका पता ही नहीं चलता और जब पता चलता है तो फिर ऐसे ही गीत गुनगुनाए जाते हैं...!
       
             मैंने तो मान लिया है बिना बेखुदी में हुए आप कुछ नहीं कर सकते....कुछ करने के लिए बेखुदी में होना ही पड़ता है..हाँ, इतना जरूर है बेखुदी में होने के लिए किसी की परवाह नहीं करनी चाहिए...आप बेपरवाह बेमुरौव्वत बेखुदी में होईए..! लेकिन आपकी बेखुदी में जब अन्य भी शामिल हों या "पैरलल"हो तब बेखुदी में होने का मजा है..जैसे सुनते हुए गाने में वे दोनों समान रूप से बेखुदी में हैं..तभी साथ-साथ गा भी रहे हैं..!! बेखुदी में होना है तो ऐसे ही होना है साथ-साथ गाना है...
          अब देखिए न! आजकल लगता है हम सब किसी की बेखुदी के शिकार बन चुके हैं...सब मिलकर लाईन में खड़े हैं...एकदम पास पास! जैसे दूरी मिट रही हो... लेकिन कुछ लोग इस बेखुदी की बेहद लानत-मलामत भी कर रहे हैं..वे बेखुदी में होने को ठीक नहीं मानते...फिर भी, कुछ लोग मिलकर समवेत बेखुदी में हो रहे हैं.. बेखुदी में हों भी क्यों न? बेखुदी में होना क्या किसी की बपौती है कि भाई आप ही बेखुदी में रहो हम नहीं हो सकते..? दूसरों की बेखुदी में होना देख भला कौन आपे में रह सकता है..ऐसे में किसी न किसी को कभी न कभी आपा खोना ही होता है...! बेखुदी में होना ही है... बिना बेखुदी में हुए यहाँ किसी को कुछ मिलता भी नहीं... 
          वाकई! हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि हम बेखुदी में होते ही नहीं अजीब सी घूँटी पिए हुए लोग हैं हम..! हमारी दिक्कत यही है कि कुछ लोग खुद बेखुदी में हो लेते हैं लेकिन सामने वाले को बेखुदी में नहीं होने देते...इसे लफड़ा बता विधिवत बेखुदी में होने को बेवकूफी का पर्यायवाची घोषित कर देते हैं....बेखुदी में होने के लफड़ों से दूसरों को डरा देते हैं...एक बात और है...यहाँ इसी वजह से कुछ ही लोगों का बेखुदी में होने का समूह भी बनता है..लेकिन लेकिन यही दूसरों को इसे लफड़ा बताते रहते हैं....कभी-कभी बेहद तेज-तर्रार लोगों को मैं बेखुदी में होकर बतियाते देखता हूँ तो ऐसा लगता है ये अपने जैसे बेखुदी में होने वालों की राजनीतिक पार्टी खड़ी कर रहे हैं...यही लोग बेखुदी का बंटाधार कर देते हैं.....
          यहाँ एक बात और...जब हम बहुत आगा-पीछा सोचते हैं तो बेखुदी में नहीं हो पाते..हमारे देश में वामपंथ आगा-पीछा सोचने वालों का समूह है..जबकि यही लोग बेखुदी में होने और होवाने का वीणा उठाने वाले लोग थे.. इनकी समस्या यही है कि केवल यही बेखुदी में रहना जानते हैं...ये बेखुदी में रहने के लिए खाद-पानी बेखुदी में न रहने वालों से ही लेते हैं...यदि ऐसा न होता तो यह देश बेखुदी में होने के लिए तरसते लोगों का देश न होता...वाकई! यह देश सदियों से बेखुदी में होने से दूर रहा है..हमारा तो राष्ट्रीय-चरित्र ही ऐसा बन चुका है..लोग करें तो क्या करें..बेखुदी में रहने वाले, इन तरसते हुए लोगों को इसका असली फंडा बताते ही नहीं.... 
         हालाँकि, कुछ ऐसे अवसर भी आए हैं जब भी हम बेखुदी में हुए  हैं तो देश का इतिहास बदल गया है...
    
        विचारों की ऐसी ही निमग्नता के साथ मैं स्टेडियम तक पहुँच गया...अन्यमनस्क से इसमें चक्कर लगाया और वापस आ गया था...
         चाय पीते हुए अखबार की खबरों पर निगाह टिकी, "हिलेरी के पक्ष में लाखों फर्जी वोट पड़े" मतलब ट्रंफ कह रहे हैं कि "हिलेरी को धांधली से ज्यादा वोट मिले" ये लो..हम तो नाहक ही मुगालता पाले हुए थे... ये बड़े मियां तो सुभानअल्ला निकले..! यहाँ के लोग भी अपने नेता के लिए बेखुदी में हो जाते हैं...खैर, अब मैं इस मामले में अपने देशवासियों को नहीं कोसुंगा....
        एक बात है..आमने-सामने की बेखुदी में नोटबंदी भी लागू हो जाती है...और...बेखुदी में लोगों के बेवफा हो जाने का भी खतरा होता है...लेकिन क्या हुआ है...क्या होगा..क्या नहीं होगा..इसकी चिन्ता छोड़ गुनगुनाएं...
      "बेखुदी में सनम..उठ गए जो कदम..आ गए...आ गए..आ गए पास हम.."
          Vinay 
           29/11/16
               दिनचर्या तो यह कल की थी लेकिन आज पोस्ट कर पाया हूँ... वैसे आज तबियत कुछ खराब सा है... स्टेडियम की ओर नहीं जा पा रहा हूँ.... (30/11/16)